Sunday, January 4, 2009

...और कोहरे को चीरता वो आ गया !


पिछले पन्नों पर: आपने अन्नू बाबू का किस्सा पढ़ा...उनकी शख्सीयत के बारे में जो कुछ मुझसे बन सका...पूरी शिद्दत के साथ बयान करने की कोशिश की...लेकिन बहुत कुछ ऐसा है जो अभी कहा जाना बाकी है....पाठकों की भारी मांग पर अन्नू बाबू की जिंदगी के बहाने अपनी जिंदगी का एक औऱ पन्ना पेश कर रहा हूं....क्योंकि सूत्रधार जॉन डीकोस्टा की वो डायरी आज फिर कुछ कहने के लिए बेचैन है....

अब तक आपने पढ़ा--अन्नू बाबू कैसे अखबार में जाते थे...तहखाने में हाजिरी बजाते थे...पानीपत से लेकर भिवानी एडिशन के पन्नों पर सिर खपाते थे...और रात को लौटते वक्त साथियों के साथ किस तरह से बहस में उलझ जाते थे...अखबार का वो बॉस जिसकी जीभ पान मसाला खाते-खाते मोटी हो गई थी...वो किस तरह से अन्नू बाबू को घुड़कता था...और अन्नू बाबू किस तरह विनीत विनम्र भाव से उसके आगे सिर नवाते थे...(हालांकि बाद में अहसास हुआ कि कई बार ओढ़ी हुई विनम्रता के बाद भी असली तेवर झलक जाता करते हैं)

अब आगे---वो जाड़ों के दिन थे...कुहासा ऐसा कि दफ्तर से घर लौटने की सीधी सड़क भी रात के सन्नाटे में विचित्र लगती थी...मानो भूत की तरह आप धुएं को चीरते हुए बाहर निकल रहे हों...औऱ अगले ही पल इसी धुएं में कहीं गुम हो जाएंगे....

ऐसे ही घनघोर कुहरे औऱ खून जमा देने वाली ठंड के बीच अन्नू बाबू अपनी चिर परिचित विंड चिटर पहने माहौल को गरमा देने वाली बहस में शिरकत करते हुए सड़क पर लेफ्ट राइट कर रहे थे...घर जाने से पहले गोल चक्कर पर चाय औऱ परांठा वाले के यहां थोड़ी देर के लिए ही सही पर रुकना हमारा अक्सर का रूटीन था....उस रोज भी रुके थे....बॉस ने अन्नू बाबू को उस शाम खूब खरी खोटी सुनाई थी....मुद्दा अखबार के अंदर के पन्नों में किसी खबर की प्लेसमेंट को लेकर था....बॉस की नजर में अन्नू बाबू ने खबर को जो ट्रीटमेंट दिया था वो दो कौड़ी का था...उन्होंने तहखाने में गुर्राते हुए अन्नू बाबू को जमकर डांट लगाई.....वो माहौल भी अजब था....डांट अन्नू बाबू खा रहे थे लेकिन सांप बाकी सब को सूंघ गया था....शायद हिंदी अखबारों की भाई साहबी पत्रकारिता की ये भी एक मानसिकता है.....
(अब भाई साहबी पत्रकारिता क्या होती है---इस पर एक चैप्टर से सूत्रधार आपको आगे कहीं जरूर
रूबरू करवाएगा।)
बॉस ने अन्नू बाबू को डांट लगाने के बाद गुटखे का पूरा पाउच मुंह के हवाले किया औऱ कुछ मिनटों तक जुगाली करने के बाद परम संतोषी भाव से डस्टबिन को पीकदान समझ कर प्रसाद उड़ेल दिया....
अन्नू बाबू उस रोज बड़े विचलित थे...साली दो कौड़ी की नौकरी है....पता नहीं क्या समझता है अपने आपको....यार मिहिर छोड़ दूंगा....मेरे बस की नहीं....खेती ही कर लूंगा....लौट जाऊंगा यार.....
ये वाकया उसी रात का है.....दो बजे हम सब सी-१३ के साथी गोल चक्कर पहुंचे चुके थे औऱ चाय के साथ वाद विवाद का दौर गरम था....अन्नू बाबू कुछ कुछ उंघते हुए और अनमने से भाव के साथ बेंच पर बैठे थे...अचानक उठे....औऱ चल पड़े....सबने कहा---अरे अन्नू बाबू क्या हो गया...कहां जा रहे हो....उनका जवाब था नहीं यार सुबह की बस पकड़नी है.....
अगली सुबह अन्नू बाबू वाकई हम सबकी आंख खुलने से पहले निकल चुके थे....पहले भी नहीं बताते थे कि आखिर जा कहां रहे हैं और इस बार भी बताने की कोई जहमत नहीं उठाई
कुहासे को चीरते हुए वो कहां चले गए इसका अहसास हम सबको तब हुआ जब हम अलसाए से उठे....लेकिन अन्नू बाबू का इस तरह जाना हमें पहले भी नहीं चौंकाता था...इसलिए इस बार भी हैरान हो जाएं...ऐसी कोई वजह नहीं दिखी....
ठंड के दिन अभी खत्म नहीं हुए थे...अब भी सुबह कुहासे में लिपटी दस्तक देती थी....सुबह तो क्या दोपहर में ही सही पर उठने के लिए हमें पहले की तरह ही जतन करने पड़ते थे....यानी सी-१३ की दुनिया अब भी वैसी ही थी... जैसी पहले थी
ऐसी ही एक सुबह कुहासे को चीरता हुए अन्नू बाबू आ धमके...
अगर आग रात को देर से सोने वालों में शुमार हैं तो आप समझ सकते हैं कि सुबह-सुबह कॉलबेल की आवाज से कर्कश दुनिया में और कुछ नहीं लगता...
उस रोज भी वैसी ही आवाज से अपने अपने कमरों में हम सबका साबका पड़ा....लेकिन उठे तो कौन...ठंड के दिनों में लिहाफ से निलकना भी तो कम बड़ी चुनौती नहीं....लेकिन हम सबके साथ नियमों के पाबंद डॉक्टर साहब भी रहते थे औऱ जब सब सोते थे वो बड़े चाव के साथ अखबार पढ़ते थे....पढ़ें चाहें नहीं भी लेकिन उनके सिरहाने सारे अखबार करीने से सजे होने चाहिए.....सो डॉक्टर साहब भी चिहुंकते हुए उठे....अरे भाई पता नहीं सुबह सुबह कौन आ गया.....दरवाजे पर अन्नू बाबू को देखकर पल भर के लिए (हालांकि मैंने नहीं देखा...लेकिन तजुर्बा बताता है कि ऐसा ही हुआ होगा) डॉक्टर साहब चौंके होंगे...चश्मा ठीक किया होगा....अरे भाई कहां गायब हो गए थे....आप भी हद हैं बताते भी नहीं...और अचानक कैसे--दफ्तर में तो खबर भी उड़ गई कि आपने रिजाइन कर दिया है....अन्नू बाबू थोड़े तरोताजा जरूर थे....लेकिन एक साथ इतने सारे सवालों से खीझ गए....कहा-हद हो गई यार....पहले अंदर तो आने दो...फिर बताता हूं...अंदर आते ही बगैर किसी सवाल का जवाब दिए वो किचेन की तरफ हो ळिए....बड़ी उदारता के साथ जितना दूध बचा था....उसे चाय बनाने के लिए स्टोव पर चढ़ा दिया...
हालांकि उनकी ये हरकत डॉक्टर साहब को बेहद नागवार गुजरी होगी....लेकिन गुस्सा उतारें तो कैसे उतारें...वो बस इतना ही कह पाए....अरे भाई आप भी सुधरिएगा नहीं...कम से कम जूते तो खोल लेते.....अन्नू बाबू ने भी चिहुंकते हुए कोई जवाब दिया होगा.....खैर ये सिलसिला ऐसा कि इसमें बताने के लिए बहुत कुछ खास नहीं

खैर सवाल एक फिर भी बचा रह गया था---आखिर अन्नू बाबू उस रोज कुहरे में कहां गुम हो गए थे औऱ जिस तरह गुम हुए उसी तरह आज कुहासे को चीरते हुए कहां से आ धमके...

इसका जवाब सूत्रधार आपको जरूर बताएगा....लेकिन फिर कभी....पर सौ फीसदी वादे के साथ कि पिक्चर तो अभी बाकी है मेरे दोस्त.....
-जॉन डीकोस्टा की डायरी
पेज नंबर-6

1 comment:

PD said...

intjar me hun ki sahab kahan gayab ho gaye the? :)