Thursday, November 25, 2010

जब तक रहेगा समोसे में आलू...



बुलबुला फूटा तो इसके फूटने की आवाज़ नहीं थी, शोर था लेकिन उस जश्न का जो बिहार में जेडी-यू और बीजेपी के कार्यकर्ता मना रहे थे। नीतीश कुमार की सोशल इंजीनियरिंग ने एक दौर में उनके साथी रहे लालू यादव के माई (यानी एमवाई= मुस्लिम यादव) समीकरण के ऐसे धुर्रे उड़ाए कि कारवां गुजर गया और लालू गुबार देखते रहे। एक अभिशप्त नायक की तरह पराजित लालू जब मीडिया के सामने आए तो उनके सामने बोलने के लिए कुछ भी नहीं था। यहां तक कि वो सौजन्यता और बड़प्पन भी नदारद थी जिसकी उनके सरीखे बड़े नेताओं से उम्मीद रखी जाती है। हार को गरिमा से स्वीकार करने के बजाय वो नीतीश-बीजेपी की जीत में रहस्य के सूत्र तलाशते नज़र आए।
लालू की राजनीति का मर्सिया तो अरसा पहले पढ़ा जाने लगा था..लेकिन हर बार लालू इन मर्सियों को अपने स्टाइल में खारिज करते रहे...लेकिन इस बार नतीजों ने उन्हें जिस तरह से खारिज किया...उसके बाद तो वापसी की कोई गुंजाइश तभी मुमकिन है जब कोई बड़ा चमत्कार हो जाए, लेकिन पॉलिटिक्स में चमत्कार नहीं होते,
लालू का इस तरह मटियामेट होना उन तमाम लोगों के लिए बहुत दुखदायी होगा जिन्होंने एक समय जेपी के 'प्रतिभाशाली' चेलों में शुमार लालू में अनंत संभावनाएं देखी थीं, लगता था गांव गंवई के बीच से आया ये आदमी बिहार को समझेगा, दबे-कुचलों का संबल बनेगा, हारे लोगों की जीत का नायक बनेगा, लेकिन इन सपनों को लालू ने अपनी सत्ता के दिनों में किस तरह पलीता लगाया, इसके भी गवाह सभी रहे हैं। सियासत में मसखरी औऱ जात के नाम पर सत्ता के फार्मूले ने उनकी राजनीति को देखते ही देखते इतना बेमानी बना दिया कि अब उनके जख्मों पर मरहम लगाने वाला भी कोई नहीं।
नीतीश भी लालू की तरह जेपी के चेले रहे हैं, जेपी आंदोलन के दौरान ही उन्हें भी राजनीति की दीक्षा मिली है, लालू के साथ राजनीतिक दोस्ती में हमसफर रहे हैं औऱ अब राजनीतिक लड़ाई में विरोधी। लेकिन नीतीश के राज-काज का अंदाज लालू से बिल्कुल जुदा है, जिसके हम सभी गवाह रहे हैं। राजनीतिक बड़बोलेपन से दूर नीतीश सत्ता के लिए समझौतावादी सियासी बाजीगरी में बहुत हद तक यकीन नहीं करते, कुछ लोग इसे उनका पॉलिटिकल एरोगेंस कहते हैं, लेकिन बिहार जैसे पिछड़े राज्य में विकास के लिए ये एरोगेंस शायद जरूरी हो चला था।
इसलिए लालू के लिए शोकगीत गाने की जरूरत नहीं, क्योंकि उनके राजनीतिक ड्रामे का द एंड तो बहुत पहले हो चुका था, अभी तो बस इस पर वक्त की मुहर भर लगी है।

Monday, November 22, 2010

ये अंधेरा हमारे वक्त का है!


विचित्र प्रोसेशन,
गम्भीर क्वीक मार्च....
कलाबत्तूवाला काला ज़रीदार ड्रेस पहने
चमकदार बैण्ड-दल--
अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप, उदर-आकृति
आँतों के जाल से, बाजे वे दमकते हैं भयंकर
गम्भीर गीत-स्वप्न-तरंगें
उभारते रहते,
ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर।
बैण्ड के लोगों के चेहरे
मिलते हैं मेरे देखे हुओं-से
लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार इसी नगर के!!
बड़े-बड़े नाम अरे कैसे शामिल हो गये इस बैण्ड-दल में!
उनके पीछे चल रहा
संगीत नोकों का चमकता जंगल,
चल रही पदचाप, ताल-बद्ध दीर्घ पाँत
टेंक-दल, मोर्टार, ऑर्टिलरी, सन्नद्ध,
धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना,
सैनिकों के पथराये चेहरे
चिढ़े हुए, झुलसे हुए, बिगड़े हुए गहरे!
शायद, मैंने उन्हे पहले भी तो कहीं देखा था।
शायद, उनमें कई परिचित!!
उनके पीछे यह क्या!!
कैवेलरी!
काले-काले घोड़ों पर ख़ाकी मिलिट्री ड्रेस,
चेहरे का आधा भाग सिन्दूरी-गेरुआ
आधा भाग कोलतारी भैरव,
आबदार!!
कन्धे से कमर तक कारतूसी बेल्ट है तिरछा।
कमर में, चमड़े के कवर में पिस्तोल,
रोष-भरी एकाग्रदृष्टि में धार है,
कर्नल, बिग्रेडियर, जनरल, मॉर्शल
कई और सेनापति सेनाध्यक्ष
चेहरे वे मेरे जाने-बूझे से लगते,
उनके चित्र समाचारपत्रों में छपे थे,
उनके लेख देखे थे,
यहाँ तक कि कविताएँ पढ़ी थीं
भई वाह!
उनमें कई प्रकाण्ड आलोचक, विचारक जगमगाते कवि-गण
मन्त्री भी, उद्योगपति और विद्वान
यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात
डोमाजी उस्ताद
बनता है बलवन
हाय, हाय!!
यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच-काय।
भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब
साफ़ उभर आया है,
छिपे हुए उद्देश्य
यहाँ निखर आये हैं,
यह शोभायात्रा है किसी मृत-दल की।
विचारों की फिरकी सिर में घूमती है
इतने में प्रोसेशन में से कुछ मेरी ओर
आँखें उठीं मेरी ओर-भर
हृदय में मानो कि संगीन नोंकें ही घुस पड़ीं बर्बर,
सड़क पर उठ खड़ा हो गया कोई शोर--
"मारो गोली, दाग़ो स्साले को एकदम
दुनिया की नज़रों से हटकर
छिपे तरीक़े से
हम जा रहे थे कि
आधीरात--अँधेरे में उसने
देख लिया हमको
व जान गया वह सब
मार डालो, उसको खत्म करो एकदम"
रास्ते पर भाग-दौड़ थका-पेल!!
गैलरी से भागा मैं पसीने से शराबोर!! (गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' से साभार)

और अंत में---2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर यूं तो कई आंकड़े हैं, लाखों करोड़ का घपला, सरकार लपेटे में, लेकिन 2 जी का सिर्फ यही सच नहीं, ये सच कई धारणाएं तोड़ने वाला है, ये सच हमारे दौर के चमचमाते नामों को झन्नाटे में चकनाचूर कर देता है, पता नहीं आपको ये सच कैसा लगा, लेकिन मैं जिस धंधे में हूं, उस धंधे में रहने के बाद भी, मोटी चमड़ी होने के बाद भी, इस सच ने मुझे जरूर हिला कर रख दिया।

Saturday, March 27, 2010

दिल्ली टू रैय्याम वाया पटना दरभंगा-पार्ट-1

रात भर के सफर में नींद ठीक ठाक आई। सुबह होते होते ट्रेन पटना पहुंच गई, राजेंद्र नगर टर्मिनल पर उतरा, पहले ये नहीं था कुछ अरसा पहले खुला है, पहले तो पटना जंक्शन पर उतरना पड़ता था, खैर बाहर निकलने पर पटना की धुंधली सी धूल भरी, थोड़ी उमसाई सुबह इंतजार कर रही थी, बदला तो कुछ भी नहीं था, आया भले सालों बाद, कुछेक इमारतें नई दिखाई दीं, रहन-सहन-पहनावे का फर्क जरूर नजर आया, सड़कें कमोबेश वैसी ही थीं, लेकिन जहां तहां ओवरब्रिज तने खड़े थे, जिससे ये अहसास जरूर हो रहा था कि शायद बिहार वाकई बदल गया है।
एक दिन पटना रूका औऱ फिर अगली सुबह पटना से रैय्याम के लिए निकल पड़ा, गंगा सेतु (पुल)जब बना था तब लोग इसे देखने के लिए बिहार भर से आते थे, नदी के इस पार से उस पार शान से खड़े इस पुल ने उस जमाने में दूरियों को जिस तरह कम दिया था वो लोगों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था, लेकिन वक्त बदला औऱ वो शान अब गर्दो गुबार में ढंक गया है। पुल जहां से शुरू होता है औऱ जहां खत्म होता है वहां तक घनघोर अराजकता के सिवा और कुछ नहीं नहीं, पुल कई जगह से टूट चुका है, थरथराते पुल पर सफर का ये अनुभव सिर्फ शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
पुल पार करने पर हाजीपुर और फिर टूटे-टाटे रास्ते में कभी पगडंडी पर गाड़ी तो कभी सड़क पर सफर बदस्तूर जारी रहा, मुजफ्फरपुर जब आया तो तो भी कहीं से नहीं लगा कि वाकई कुछ बदला है, ना कोई ट्रैफिक, ना ही सड़क, बहुत साल पहले गर्व से भरे वो बोल याद आए जब लोग मुजफ्फरपुर की तुलना ना जाने दुनिया के किन किन शहरों से करते थे। लेकिन सचमुच ऐसा लगा जैसे घड़ी की सुई यहां उलटी घूम रही है,
वैसे पूरा किस्सा बताते बताते ये जरूर साफ कर दूं कि मकसद कहीं से बिहार के विकास की परख का नहीं है,
इसे बस एक डायरी के चंद पन्ने समझ लीजिए, जिसपे आप कई बार यूं हीं बेमतलब कुछ लिख जाते हैं, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।

Wednesday, November 4, 2009

अपने-अपने दोजख




ख्वाबों के जंगल में भटकते हुए
पीली धूप के किसी पेड़ तले
उकताए, हारे, हांफते
एक दूसरे को निहारते...

कुछ महीने पहले सैय्यद जैगम इमाम की कविता पर लिखते वक्त अहसास नहीं था कि पीली धूप के पेड़ों तले एक दोजख भी है...लेकिन नहीं वो भूल थी जिसका अहसास मुझे अब हो रहा है..सबके अपने अपने दोजख हैं....और जैगम इमाम का भी..टीवी की व्यस्त दुनिया के बावजूद जैगम का पहला उपन्यास हाथों में देखकर यकीन नहीं हुआ...उपन्यास पहला जरूर है लेकिन मैच्योरिटी के लिहाज से जैगम पहली नजर में बड़े बड़ों की कन्नी काटते नजर आते हैं...
कहानी सीधी सी है...चंदौली जैसे छोटे से कस्बे का छोटा सा अल्लन...छोटे सपने-ललचाने वाले सपने...मचलने वाले अरमान...हहराती गंगा की लहरों में कूदने की ख्वाहिश...पतंगों औऱ कंचों में बसी दुनिया...सख्त अब्बा औऱ मुलायम मिजाज अम्मा की दुनिया..इस मासूम सी दुनिया में क्या कोई दोजख भी हो सकता है...क्या जन्नतों में भी नर्क की गुंजाइश है....ये सब सवाल जैगम चकित करने वाले भोलेपन के साथ उठाते हैं..ठीक उसी भोलेपन से जैसे वो पीली धूप के पेड़ों की तलाश में नज्म लिखते हैं....
उपन्यास की पूरी कथा मुख्य किरदार अल्लन के इर्द गिर्द घूमती है...अल्लन को भी पीली धूप के पेड़ों की तलाश है...अपनी छोटी सी दुनिया को देखकर अल्लन दिन-रात हैरान होता है...खुद से सवाल करता है...लेकिन ट्रैजिडी यही है कि उसे जवाब नहीं मिलते...ये ट्रैजिडी मन को बेहद छूती है...सच कहें तो कई बार आंखों को गीली कर देती है...
समाजशास्त्रीय खांचे के उत्तर आधुनिक विमर्श में उपन्यास कई बार सरहदों को तोड़ता दिखता है...कई बार ये सवाल उठते हैं कि क्या वाकई ऐसा मुमकिन है...क्या कस्बे के मामूली से लड़के का द्वंद्व ऐसा भी हो सकता है...लेकिन कहानी में अल्लन ही सबकुछ हो ऐसा भी नहीं है...क्योंकि आखिर में अल्लन के अब्बा की जो तस्वीर उकेरी गई है...वो औऱ भी झिंझोड़ने वाली है...वो पाठकों को औऱ भी भावुक करने वाली है....
खैर कहानी का खुलासा औऱ करना मुनासिब नहीं होगा...लेकिन जैगम को इस बात के लिए जरूर बधाई मिलनी चाहिए कि उन्होंने चंदौली के मिजाज को जिस भाषा में बयान किया है वो वाकई दिल के करीब है...कई जगह भदेस है...लेकिन ये भदेसपन भाता है...अल्लन की गालियां दिल को छूती हैं...कई पुराने शब्द जेहन में ताजा हो जाते हैं...
फेरन लवली (फेयर एंड लवली)..ये भी ऐसा ही एक लफ्ज है...
उपन्यास वक्त के खांचे में कितना फिट बैठता है इसका इंसाफ तो आने वाले साल करेंगे...पर ठोकबजाकर अभी ये राय जरूर बनाई जा सकती है कि जैगम का ये उपन्यास एक मजबूत आगाज है...हवा के ताज़ा झोंके की तरह है...ठीक उसी तरह जैसे आप किसी महानगर की सीलन भरी हवा से खुले जंगल-गांव में पहुंचते हैं औऱ ठंडी हवा के झोंके से अजीब सी झुरझरी देह को पल भर के लिए थरथरा देती है...
अल्लन भी आपको ऐसे ही सिहरने के लिए मजबूर कर देगा...

एक जानकारी--ये किताब राधाकृष्ण प्रकाशन ने छापी है

Sunday, October 25, 2009

....तब कलेजा फट गया

भावुक नहीं हूं.....धर्म कर्म में दिलचस्पी भी बस स्वार्थ भर...गहरी मुसीबत में फंसे तो देवी-देवताओं को याद कर लिया....लेकिन फिर क्यों आंखें गीली हो गईं...गला रुंध गया...बरसों पीछे छूट गया वो नदी जैसा गंगासागर तालाब याद आया......घाटों पर छूटने वाले पटाखों की रोशनी और धमक जैसे ताजा हो गई....छठ के मौके पर घर की गहमागहमी याद आई औऱ ठेकुए की खुशबू भी कौंध गई....
मनोज तिवारी से लेकर दूसरे गायकों के छठी मइया पर गाए गानों को सुनकर ऐसा क्यों लगा मानो कलेजा फट गया हो...मां हर साल छठ पर आने के लिए कहती रहीं....लेकिन शहर छूटा तो ऐसा कि कभी जा ना सका....अब तो मां ने बीमार रहने और उम्र के चलते छठ उस तरह से करना छोड़ दिया है....लेकिन छठ के मौके पर जाना फिर भी ना हो सका.....
फिर आखिर वो कौन सी हूक थी कि जब मनोज तिवारी को छठी मईया के गाने गाते सुना तो रहा नहीं गया....क्यों याद आ गए वे दिन जब बचपन में छठ के लिए घाट को सजाने संवारने के लिए यार-दोस्तों के साथ घंटों बिताता था....सुबह टोकरी लेकर घाट पर जाना....भीड़ में मुश्किल से जगह बनाना....औऱ फिर सुबह के अर्घ्य के बाद घर लौटकर भरपेट प्रसाद खाना...औऱ मां के व्रत तोड़ने के लिए बने स्वादिष्ट खाने का छककर लुत्फ उठाना ....सब जैसे फ्लैशबैक की तरह आंखों के सामने डूबता उतराता रहा....छठ के ज्यादातर गानों को सुनें तो धुन एक सी लगती है....ये गाने तब उतने नहीं खींचते थे....लेकिन दस साल बाद मन की केमिस्ट्री में आखिर ऐसा क्या बदलाव आ गया कि छठी मइया के उन गानों को सुनकर पल भर के लिए लगा मानो मन विचलित हो गया हो....
कहीं ऐसा तो नहीं कि आप जितने बड़े होते जाते हैं उतने ही पीछे के दिनों में गहरे डूबते जाते हैं.....खैर कई चीजों के लिए कोई दलील नहीं दी जा सकती...शायद इसके लिए भी मेरे पास कोई तर्क नहीं.....लेकिन हर चीज के लिए कोई वाजिब वजह हो ये भी तो जरूरी नहीं....आंखें हैं, छलक पड़ीं तो छलक पड़ीं....क्या फर्क पड़ता है कि आप भावुक हैं या नहीं.....कलेजा चाक हो गया तो हो गया....इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि जिंदगी के दूसरे तमाम मौकों पर आप कितने पत्थर दिल थे....

Sunday, June 14, 2009

हो सके तो माफ कर देना...

हो सकता है आज सुबह आप जब चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहे हों तो ये खबर कहीं किसी कोने में दिख जाए....खबर का शीर्षक कुछ इस तरह से हो सकता है...सिर में चोट लगने से मजदूर ने दम तोड़ा....बहुत मुमकिन है कि तीन चार लाइनों की ये खबर अखबार में फिलर (खाली जगह भरने के लिए) की तरह इस्तेमाल की जाए...

खबर मामूली होगी और आप गौर करने की जहमत क्यों उठाएं...आखिर दिल्ली की दौड़ती भागती सड़कों पर हादसे होते रहते हैं लेकिन हममें से कितने ठहरते हैं...हो सकता है पल भर के लिए थमते हों...लेकिन फिर उचटती निगाह से जायजा लेकर...या तमाशबीनों की भीड़ में किसी एक से रुटीन सा सवाल कि भाई साहब क्या हुआ है...पूछकर ज्यादातर चलते बनते हैं...
लेकिन ये वाकया ऐसा नहीं है...आप चलते भी बने तो ये आपका पीछा नहीं छोड़ेगा...
क्योंकि उसकी लाश अब भी अस्पताल के सीलन से भरे सर्द मुर्दाघर में औपचारिकताओं का इंतजार कर रही होगी...क्योंकि ये पूरी कहानी जीते-जागते आदमी के चंद घंटों में दम तोड़ने की है....ये अस्पतालों की बेरहमी के उस भयावह सच की एक औऱ खौफनाक दास्तां है...जिससे हम सबका साबका आए दिन पड़ता रहता है...कैलाश नाम का एक मजदूर काम करते वक्त छत से नीचे गिरकर घायल हो जाता है...सिर में गंभीर चोट लगती है और उसे आनन फानन में रोहिणी के अंबेडकर अस्पताल ले जाया जाता है...वहां के डॉक्टर हाथ खड़े कर देते हैं....मामूली मरहम पट्टी करके दिल्ली के बड़े अस्पतालों में शुमार आरएमएल हॉस्पीटल रेफर कर दिया जाता है....आरएमएल में जख्मी मजदूर को भर्ती नहीं किया जाता...बल्कि बहानेबाजी कर दूसरे बड़े अस्पताल एलएनजेपी भेज दिया जाता है....एलएनजेपी अस्पताल में भी किसी डॉक्टर का दिल नहीं पसीजता....इस बीच, कैट के एंबुलेंस में स्ट्रेचर पर पड़े कैलाश की हालत लगातार बिगड़ रही होती है....दोपहर रात में तब्दील हो चुकी होती है...डॉक्टरों को भी छुट्टी चाहिए शनिवार की शाम है...वीकेंड्स बर्बाद क्यों करें....क्या फर्क पड़ता है कोई मरे तो अपनी बला से...कैलाश कोई वीआईपी नहीं.. अगर कुछ हो भी गया तो क्लास लगने का डर तो नहीं....
लेकिन सारे डॉक्टर एक जैसे नहीं होते...उसी कैट की एंबुलेंस में अंबेडकर अस्पताल की एक महिला डॉक्टर भी घंटों से है...वो भी अपनी बिरादरी के दूसरे साथियों के बर्ताव से परेशान है...कुछ समझ नहीं आ रहा कि आखिर करे तो क्या करे....रात अब सुबह से कुछ घंटों की दूरी पर है.....लेकिन मौत कैलाश के सिरहाने खड़ी है....मौत औऱ कैलाश का फासला तेज़ी से कम हो रहा है....और फिर देखते ही देखते नीमबेहोशी की हालत में घंटों से जिंदगी के लिए जूझ रहा कैलाश आखिर मौत से हार जाता है....

अंत में--जिस कैलाश को जीते जी एलएनजेपी अस्पताल ने भर्ती नहीं किया...उसी के पार्थिव शरीर को कम से कम अस्पताल के मुर्दाघर में जगह मिल जाती है....कागजी कार्रवाई होनी है...पोस्टमार्टम होना है....
आखिर कहूं तो क्या कहूं...लिखूं तो क्या लिखूं...सिवा इसके कि कैलाश हो सके तो माफ कर देना...

Wednesday, June 10, 2009

टीवी, टीआरपी औऱ गरियाने का समाजशास्त्र !

हाल के कुछ महीनों में खबरिया चैनलों की खूब खिंचाई हुई...कभी मुंबई हमलों के बहाने धोया गया तो कभी टीआरपी के पुराने डंडे को हथियार बनाकर पीटा गया....
हद तो तब हो गई जब टीवी की दुनिया में कुछ महीने या कुछ सालों पहले तक सक्रिय रहे पत्रकारों ने भी बड़ी बेरहमी से मनगढ़ंत कहानियां दुनिया के सामने पेश करने में जरा भी झिझक नहीं महसूस की...कंटेट पर सवाल उठाए गए...औऱ तमाम चैनलों की नीयत पर शक किया गया....इक्का दुक्का चैनलों को जरूर बेनिफिट ऑफ डाउट देकर छोड़ दिया गया औऱ दलील ये दी गई कि वो चैनल शोषितों औऱ वंचितों की बात करते हैं...किसानों-मजदूरों के हको-हकूक की बात उठाते हैं...असली इंडिया दिखाते हैं...हो सकता है...दिखाते भी हों...उन्हें गलत साबित करना मेरा मकसद नहीं...
मकसद सिर्फ ये बताना है कि गरियाना इन दिनों फैशन बन गया है....किसी के बारे में ना आगे सोचो ना पीछे---जी भर के गाली दो...सुर्खियां खुद ब खुद मिल जाएंगी....मिसालें भरी पड़ी हैं...ऐसा ही कुछ रोज पहले हुआ था जब अचानक मुझे खुशवंत सिंह पर एक सज्जन की प्रतिक्रिया पढ़ने को मिली...खुशवंत की लानत-मलानत जिस छिछोरे अंदाज में की गई थी...उससे साफ था कि जिन सज्जन ने भी शब्दों की ये उलटी की थी...उन्होंने शायद ही खुशवंत को कभी पढ़ा होगा...शायद वो ये भी नहीं जानते होंगे कि खुशवंत सिर्फ अखबारों में रसीले कॉलम नहीं लिखते...उनका लिखा ऐसा बहुत कुछ है जिसकी अकादमिक काबिलियत पर बड़े बड़े आलोचक भी टिप्पणी करने से कतराते हैं....मैं खुशवंत सिंह को दुनिया का सबसे महान लेखक साबित करने की ना तो हैसियत रखता हूं...औऱ ना ही ये दावा कर रहा हूं...मैंने ये वाकया सिर्फ ट्रेंड बताने के लिए आपके सामने पेश किया है....
इसी तरह टीवी और टीआरपी की बात करें....भूत-प्रेत-क्रिकेट-बॉलीवुड से सने कंटेंट की बात करें तो यकीनन आलोचना की गुंजाइश हर माध्यम में है और उतने के हकदार खबरिया चैनल भी हैं....इसके लिए ना तो मैं कोई सफाई पेश करना चाहता हूं औऱ ना ही इन्हें जायज ठहराने के लिए दलील दे रहा हूं....लेकिन गरियाने के फैशन में मशगूल भाई-बंधुओं को ये जरूर याद दिलाना चाहता हूं दर्शक जिसे चाहता है उसे देखता है....समय से बड़ा सेंसर बोर्ड कोई नहीं होता क्योंकि इसकी कैंची बड़ी बेरहम होती है....भूत-प्रेत अब ज्यादातर चैनलों से हवा हो चुके हैं....ऊटपटांग खबरें भी अब ज्यादातर चैनलों पर हाशिये में चली गई हैं....रहा सवाल क्रिकेट का तो अगर कोई खेल देश में सबसे ज्यादा देखा जाता है...जिसके हीरो अपने चाहने वालों की नजर में भगवान से कम नहीं...तो उनकी खबरें दिखाकर टीवी चैनल कौन सा गैरजमानती अपराध कर देते हैं...ये समझ से परे है!
खबरिया चैनलों से पुराना अखबारों का इतिहास है...लेकिन क्या एक भी अखबार का नाम जेहन में आता है जो बॉलीवुड की गर्मागर्म खबरों को छौंक लगाकर नहीं पेश करता हो...आखिर शीतल मफतलाल की गिरफ्तारी और फिर जमानत रातोंरात राष्ट्रीय महत्व की खबर कैसे बन जाती है! लेकिन तब तो आप खामोश हैं....लेकिन पड़ोसी मुल्क जहां की हर छोटी बड़ी घटना का असर हमारे देश पर हो सकता है...वहां तालिबान की करतूतों पर चैनलों ने दिखा दिया तो मानो पहाड़ टूट पड़ा हो....
...खैर अगली बार आप टीआरपी के बहाने खबरिया चैनलों की क्लास लेने में जुटे हुए हों तो जरा खुद के अंदर भी जरूर झांकिएगा....सिर्फ सुर में सुर मिलाकर गरियाने से लोकतंत्र नहीं मजबूत होता....आप दर्शक हैं...रिमोट उठाइये...औऱ बदल दीजिए वो चैनल जो आप नहीं देखना चाहते...