Sunday, December 28, 2008

ये साल अच्छा है...

ढलती शाम की पीली-धुंधली-सिमटती सी धूप कई बार भीड़ में भी अकेलेपन का अहसास कराती है... खासकर अगर आप इंडिया गेट जैसी जगह पर हों तो अकेलापन आपको काटने भले ही नहीं दौड़े लेकिन दार्शनिक जरूर बना देता है....इत्तफाक से क्रिसमस वाले दिन मेरी छुट्टी थी...दिन ढलने को था औऱ मैं भी पता नहीं क्यों उस रोज इंडिया गेट चला गया....
घास पर लेटा...तो अचानक पता नहीं क्यों गुजर रहा साल जैसे मेरे सामने पूरी शिद्दत के साथ खड़ा था...हर रोज का हिसाब किताब माथे में घूम रहा था
साल ऐसे कई गुजारे पर नहीं मालूम क्यों ऐसा लगा मानो ये साल बस बीत गया...
घटनाएं आंखों के सामने फ्लैशबैक की तरह गुजरती चली गईं...मैं उनमें बहता चला गया....
समय के इस प्रवाह में ज्यादा क्या कहूं...क्या ना कहूं
लेकिन बस उम्मीद है जो हमको आपको सबको चलाए जाती है...
गुजरा है जो, वो साल अच्छा था
आएगा जो साल वो भी अच्छा होगा
फिलहाल उधार की चंद लाइनों के साथ आपको छोड़े जाता हूं---
-एक बिरहमन ने कहा है ये साल अच्छा है
ज़ुल्म की रात बहुत जल्द टलेगी अब तो
आग चूल्हों में हर इक रोज़ जलेगी अब तो
भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोएगा
चैन की नींद हर इक शख्स़ यहां सोएगा
आंधी नफ़रत की चलेगी ना कहीं अब के बरस
प्यार की फ़सल उगाएगी जमीं अब के बरस
है यकीं अब ना कोई शोर-शराबा होगा
ज़ुल्म होगा ना कहीं ख़ून-ख़राबा होगा
ओस और धूप के सदमे ना सहेगा कोई
अब मेरे देश में बेघर ना रहेगा कोई
नए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा है

रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा है
दिल को ख़ुश रखने को गालिब ये ख़याल अच्छा है


आमीन

3 comments:

जै़गम said...

बेहद खूबसूरत...लेकिन अफसोस सिर्फ ख्याल है???????

atit said...

उम्मीद पर दुनिया क़ायम है। हमें आपको भी ख़ुद के भरोसे पर क़ायम रहना होगा,ताकि साल अच्छे गुज़रते रहें और लम्हों के दिनों हफ़्तों महीनों और सालों में बदलने के साथ साथ ये ज़िंदगी तमाम हो जाए। और जो कहीं तमाम उम्र का हिसाब ज़िंदगी मानने लगे तो...

Anonymous said...

वो अन्नू बाबू का क्या हुआ मिहिर बोस?