Tuesday, October 28, 2008

इस पगलाई व्यवस्था में किसी का बचना मुश्किल है!

राहुल राज...एक ऐसा लड़का जिसे हम आप कल से पहले तक नहीं जानते थे...जो पटना से बोरिया-बिस्तर उठाए दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में मुंबई पहुंचा...कभी नहीं लौटने के लिए...उसी राहुल राज का चेहरा अब भी आंखों के सामने कौंध रहा है...बेस्ट की डबल डेकर बस की खिड़की से झांकता...डरा सहमा...हाथों में पिस्तौल...(पता नहीं नकली थी या असली!) बदहवास राहुल राज...रूट नंबर ३३२ की बस में कभी इस खिड़की को बंद करता तो कभी चिल्ला चिल्ला कर अपनी बात कहने की कोशिश करता....लेकिन तब तक देर हो चुकी थी...क्योंकि खतरा बड़ा था....लिहाजा उसका एनकाउंटर कर दिया गया...३३२ नंबर की बस में जिंदगी और मौत की इस खींचतान में सबकुछ कुछ मिनटों के भीतर खत्म हो गया....अंदर थी राहुल राज की लाश...औऱ बाहर जश्न मनाती पुलिस....फिर महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटील का फिल्मी बयान...गोली का जवाब गोली से दिया जाएगा...जिंदगी-मौत के इस पूरे ड्रामे में कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब अभी महाराष्ट्र सरकार औऱ पुलिस दोनों को देना बाकी है....क्या राहुल राज को जिंदा नहीं पकड़ा जा सकता था....क्या ये कारगर नहीं होता कि उसे बातों में उलझाए रखा जाता और फिर उसे काबू में करने की कोशिश की जाती....क्या हमारी पुलिस एक हार्डकोर क्रिमिनल औऱ अचानक जज्बाती हो गए एक लड़के में कोई फर्क नहीं समझती....राहुल राज कोई आतंकवादी नहीं था...उसके घरवालों, दोस्तों-करीबियों, पटना में उसके इलाके की पुलिस सभी के बयान इसी की तस्दीक करते हैं... मेरा ये कतई मतलब नहीं कि राहुल ने जो तरीका अपनाया उसे सही साबित करूं...बल्कि यहां जरूरी ये है कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया....इसके पीछे की वजह क्या है...इसके लिए आपको थोड़ा पीछे जाना होगा....मुंबई के उस मंजर को याद करना होगा जब एमएनएस के गुंडे उत्तर भारतीय छात्रों को खदेड़ खदेड़ कर मार रहे थे...परीक्षा हॉल से खदेड़ रहे थे औऱ स्टेशनों पर पीट रहे थे....टीवी पर हर छोटी बड़ी खबर को ब्रेकिंग न्यूज बनाने के इस दौर में ये तस्वीरें भी चौबीसों घंटे दिखाई जाती रहीं...इन तस्वीरों को देखकर बिहार में जो प्रतिक्रिया हुई वो भी आप सब के सामने है...ऐसे में हो सकता है कोई बेरोजगार बहक जाए...उसकी भावनाओं पर असर पड़े...उसके दिलो-दिमाग में नफरत का ज़हर भर जाए...उसकी दिमागी हालत का अंदाजा लगाइये...सबकुछ साफ हो जाएगा...लेकिन संवेदनहीन होते इस दौर में इसकी फिक्र कौन करता है....किसे मतलब है कि कौन जिंदा है...कौन मर गया....ऐसे में मुंबई जैसे महानगर में एक दिन किसी बस पर सवार कोई नौजवान अगर राज ठाकरे को चीख-चीखकर चुनौती देने लगे...हवा में तमंचा लहराने लगे....तो ये मत समझिएगा कि वो आतंकवादी है...वो अपराधी है....दरअसल ये खोट इस पगलाए हुए दौर का है जिसमें किसका सिर कब फिर जाए कहना मुश्किल है...जिसमें नियति कब किसको राहुल राज बना दे...कहना मुश्किल है...

3 comments:

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर said...

sriman jee vyavstha hai hee nahi, isliye uske paglane ka swal hee kahan hai.
narayan narayan

Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak " said...

पगली नहीं ये दुष्ट है, समझो इसके दोष.
भारत को खा जायेगी, अगर ना आया होश.
अगर ना आया होश, विश्व डूबेगा सचमुच.
भारत ना बच पाया तो,फ़िर कौन है सचमुच.
कह साधक कवि, इन्डिया का यह तन्त्र दुष्ट है.
समझो पूरे दोष, पगली नही ये दुष्ट है.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

श्रीमान जी बिल्कुल ठीक लिखा है आपने, देश को एक सर्जरी और एक हिटलर जैसे सर्जन की आवश्यकता है. यहाँ व्यवस्था तभी सुधरेगी जब खुफिया के द्वारा लोगों पर शिकंजा कसा जायेगा. अन्यथा रोज ही अराजकता के नए नमूने देखने को मिलेंगे. राहुल को मारकर बहादुरी दिखने वाली यह वही पुलिस है, जो बबलू, अबू-सलेम, मुख्तार अंसारी जैसे लोगों के आगे बौनी नजर आती है. देसी तमंचे से एक-दो से ज्यादा गोली दागी ही नहीं जा सकती थीं. उसे बेहोश किया जा सकता था. आंसू गैस, बेहोश करने वाली गैस, रबर बुलेट का प्रयोग कर जिन्दा पकड़ा जा सकता था, यह हत्या ही है, लोकतंत्र की, जहाँ आतंकवादी छोड़ दिए जाते हैं और एक बीस साल के लड़के को गोली से मार दिया जाता है.