<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741</id><updated>2012-02-17T10:04:48.855+05:30</updated><category term='साहित्य'/><category term='समाज'/><category term='जॉन डीकोस्टा की डायरी'/><title type='text'>गली करतार सिंह</title><subtitle type='html'>गली जिसमें दुनिया बसती थी...जिसका ना कोई ओर-छोर तब था और ना ही आज है....वो गली अब भी पुरानी दिल्ली के एक धुंधले से कोने में पीछे छूट गई सदी के लोगों से गुलजार है..लेकिन उसे किसी का इंतजार नहीं...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>31</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-8994915678642181494</id><published>2010-11-25T05:25:00.003+05:30</published><updated>2010-11-25T07:06:43.195+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>जब तक रहेगा समोसे में आलू...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/TO29PyT4FOI/AAAAAAAAAFQ/lVQb4fLT3_8/s1600/06nitish-laloo.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 161px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/TO29PyT4FOI/AAAAAAAAAFQ/lVQb4fLT3_8/s200/06nitish-laloo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5543294795263775970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुलबुला फूटा तो इसके फूटने की आवाज़ नहीं थी, शोर था लेकिन उस जश्न का जो बिहार में जेडी-यू और बीजेपी के कार्यकर्ता मना रहे थे। नीतीश कुमार की सोशल इंजीनियरिंग ने एक दौर में उनके साथी रहे लालू यादव के माई (यानी एमवाई= मुस्लिम यादव) समीकरण के ऐसे धुर्रे उड़ाए कि कारवां गुजर गया और लालू गुबार देखते रहे। एक अभिशप्त नायक की तरह पराजित लालू जब मीडिया के सामने आए तो उनके सामने बोलने के लिए कुछ भी नहीं था। यहां तक कि वो सौजन्यता और बड़प्पन भी नदारद थी जिसकी उनके सरीखे बड़े नेताओं से उम्मीद रखी जाती है। हार को गरिमा से स्वीकार करने के बजाय वो नीतीश-बीजेपी की जीत में रहस्य के सूत्र तलाशते नज़र आए। &lt;br /&gt;लालू की राजनीति का मर्सिया तो अरसा पहले पढ़ा जाने लगा था..लेकिन हर बार लालू इन मर्सियों को अपने स्टाइल में खारिज करते रहे...लेकिन इस बार नतीजों ने उन्हें जिस तरह से खारिज किया...उसके बाद तो वापसी की कोई गुंजाइश तभी मुमकिन है जब कोई बड़ा चमत्कार हो जाए, लेकिन पॉलिटिक्स में चमत्कार नहीं होते, &lt;br /&gt;लालू का इस तरह मटियामेट होना उन तमाम लोगों के लिए बहुत दुखदायी होगा जिन्होंने एक समय जेपी के 'प्रतिभाशाली' चेलों में शुमार लालू में अनंत संभावनाएं देखी थीं, लगता था गांव गंवई के बीच से आया ये आदमी बिहार को समझेगा, दबे-कुचलों का संबल बनेगा, हारे लोगों की जीत का नायक बनेगा, लेकिन इन सपनों को लालू ने अपनी सत्ता के दिनों में किस तरह पलीता लगाया, इसके भी गवाह सभी रहे हैं। सियासत में मसखरी औऱ जात के नाम पर सत्ता के फार्मूले ने उनकी राजनीति को देखते ही देखते इतना बेमानी बना दिया कि अब उनके जख्मों पर मरहम लगाने वाला भी कोई नहीं। &lt;br /&gt;नीतीश भी लालू की तरह जेपी के चेले रहे हैं, जेपी आंदोलन के दौरान ही उन्हें भी राजनीति की दीक्षा मिली है, लालू के साथ राजनीतिक दोस्ती में हमसफर रहे हैं औऱ अब राजनीतिक लड़ाई में विरोधी। लेकिन नीतीश के राज-काज का अंदाज लालू से बिल्कुल जुदा है, जिसके हम सभी गवाह रहे हैं। राजनीतिक बड़बोलेपन से दूर नीतीश सत्ता के लिए समझौतावादी सियासी बाजीगरी में बहुत हद तक यकीन नहीं करते, कुछ लोग इसे उनका पॉलिटिकल एरोगेंस कहते हैं, लेकिन बिहार जैसे पिछड़े राज्य में विकास के लिए ये एरोगेंस शायद जरूरी हो चला था।&lt;br /&gt;इसलिए लालू के लिए शोकगीत गाने की जरूरत नहीं, क्योंकि उनके राजनीतिक ड्रामे का द एंड तो बहुत पहले हो चुका था, अभी तो बस इस पर वक्त की मुहर भर लगी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-8994915678642181494?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/8994915678642181494/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=8994915678642181494' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/8994915678642181494'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/8994915678642181494'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2010/11/blog-post_25.html' title='जब तक रहेगा समोसे में आलू...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/TO29PyT4FOI/AAAAAAAAAFQ/lVQb4fLT3_8/s72-c/06nitish-laloo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-1632679586212618337</id><published>2010-11-22T00:21:00.007+05:30</published><updated>2010-11-22T01:12:19.688+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>ये अंधेरा हमारे वक्त का है!</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/TOlr9ZCOl8I/AAAAAAAAAFI/cN6I9zVvAto/s1600/outlook.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 100px; height: 140px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/TOlr9ZCOl8I/AAAAAAAAAFI/cN6I9zVvAto/s200/outlook.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5542079518892529602" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;विचित्र प्रोसेशन,&lt;br /&gt;गम्भीर क्वीक मार्च....&lt;br /&gt;कलाबत्तूवाला काला ज़रीदार ड्रेस पहने&lt;br /&gt;चमकदार बैण्ड-दल--&lt;br /&gt;अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप, उदर-आकृति&lt;br /&gt;आँतों के जाल से, बाजे वे दमकते हैं भयंकर&lt;br /&gt;गम्भीर गीत-स्वप्न-तरंगें&lt;br /&gt;उभारते रहते,&lt;br /&gt;ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर।&lt;br /&gt;बैण्ड के लोगों के चेहरे&lt;br /&gt;मिलते हैं मेरे देखे हुओं-से&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; इसी नगर के!!&lt;br /&gt;बड़े-बड़े नाम अरे कैसे शामिल हो गये इस बैण्ड-दल में!&lt;br /&gt;उनके पीछे चल रहा&lt;br /&gt;संगीत नोकों का चमकता जंगल,&lt;br /&gt;चल रही पदचाप, ताल-बद्ध दीर्घ पाँत&lt;br /&gt;टेंक-दल, मोर्टार, ऑर्टिलरी, सन्नद्ध,&lt;br /&gt;धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना,&lt;br /&gt;सैनिकों के पथराये चेहरे&lt;br /&gt;चिढ़े हुए, झुलसे हुए, बिगड़े हुए गहरे!&lt;br /&gt;शायद, मैंने उन्हे पहले भी तो कहीं देखा था।&lt;br /&gt;शायद, उनमें कई परिचित!!&lt;br /&gt;उनके पीछे यह क्या!!&lt;br /&gt;कैवेलरी!&lt;br /&gt;काले-काले घोड़ों पर ख़ाकी मिलिट्री ड्रेस,&lt;br /&gt;चेहरे का आधा भाग सिन्दूरी-गेरुआ&lt;br /&gt;आधा भाग कोलतारी भैरव,&lt;br /&gt;आबदार!!&lt;br /&gt;कन्धे से कमर तक कारतूसी बेल्ट है तिरछा।&lt;br /&gt;कमर में, चमड़े के कवर में पिस्तोल,&lt;br /&gt;रोष-भरी एकाग्रदृष्टि में धार है,&lt;br /&gt;कर्नल, बिग्रेडियर, जनरल, मॉर्शल&lt;br /&gt;कई और सेनापति सेनाध्यक्ष&lt;br /&gt;चेहरे वे मेरे जाने-बूझे से लगते,&lt;br /&gt;उनके चित्र समाचारपत्रों में छपे थे,&lt;br /&gt;उनके लेख देखे थे,&lt;br /&gt;यहाँ तक कि कविताएँ पढ़ी थीं&lt;br /&gt;भई वाह!&lt;br /&gt;उनमें कई प्रकाण्ड आलोचक, विचारक जगमगाते कवि-गण&lt;br /&gt;मन्त्री भी, उद्योगपति और विद्वान&lt;br /&gt;यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात&lt;br /&gt;डोमाजी उस्ताद&lt;br /&gt;बनता है बलवन&lt;br /&gt;हाय, हाय!!&lt;br /&gt;यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच-काय।&lt;br /&gt;भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब&lt;br /&gt;साफ़ उभर आया है,&lt;br /&gt;छिपे हुए उद्देश्य&lt;br /&gt;यहाँ निखर आये हैं,&lt;br /&gt;यह शोभायात्रा है किसी मृत-दल की।&lt;br /&gt;विचारों की फिरकी सिर में घूमती है&lt;br /&gt;इतने में प्रोसेशन में से कुछ मेरी ओर&lt;br /&gt;आँखें उठीं मेरी ओर-भर&lt;br /&gt;हृदय में मानो कि संगीन नोंकें ही घुस पड़ीं बर्बर,&lt;br /&gt;सड़क पर उठ खड़ा हो गया कोई शोर--&lt;br /&gt;"मारो गोली, दाग़ो स्साले को एकदम&lt;br /&gt;दुनिया की नज़रों से हटकर&lt;br /&gt;छिपे तरीक़े से &lt;br /&gt;हम जा रहे थे कि&lt;br /&gt;आधीरात--अँधेरे में उसने&lt;br /&gt;देख लिया हमको&lt;br /&gt;व जान गया वह सब&lt;br /&gt;मार डालो, उसको खत्म करो एकदम"&lt;br /&gt;रास्ते पर भाग-दौड़ थका-पेल!!&lt;br /&gt;गैलरी से भागा मैं पसीने से शराबोर!! (गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' से साभार)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अंत में---2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर यूं तो कई आंकड़े हैं, लाखों करोड़ का घपला, सरकार लपेटे में, लेकिन 2 जी का सिर्फ यही सच नहीं, ये सच कई धारणाएं तोड़ने वाला है, ये सच हमारे दौर के चमचमाते नामों को झन्नाटे में चकनाचूर कर देता है, पता नहीं आपको ये सच कैसा लगा, लेकिन मैं जिस धंधे में हूं, उस धंधे में रहने के बाद भी, मोटी चमड़ी होने के बाद भी, इस सच ने मुझे जरूर हिला कर रख दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-1632679586212618337?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/1632679586212618337/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=1632679586212618337' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/1632679586212618337'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/1632679586212618337'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='ये अंधेरा हमारे वक्त का है!'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/TOlr9ZCOl8I/AAAAAAAAAFI/cN6I9zVvAto/s72-c/outlook.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-5133399119769259953</id><published>2010-03-27T14:42:00.005+05:30</published><updated>2010-03-27T15:33:04.676+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>दिल्ली टू रैय्याम वाया पटना दरभंगा-पार्ट-1</title><content type='html'>&lt;strong&gt;रात भर के सफर में नींद ठीक ठाक आई। सुबह होते होते ट्रेन पटना पहुंच गई&lt;/strong&gt;, राजेंद्र नगर टर्मिनल पर उतरा, पहले ये नहीं था कुछ अरसा पहले खुला है, पहले तो पटना जंक्शन पर उतरना पड़ता था, खैर बाहर निकलने पर पटना की धुंधली सी धूल भरी, थोड़ी उमसाई सुबह इंतजार कर रही थी, बदला तो कुछ भी नहीं था, आया भले सालों बाद, कुछेक इमारतें नई दिखाई दीं, रहन-सहन-पहनावे का फर्क जरूर नजर आया, सड़कें कमोबेश वैसी ही थीं, लेकिन जहां तहां ओवरब्रिज तने खड़े थे, जिससे ये अहसास जरूर हो रहा था कि शायद बिहार वाकई बदल गया है।&lt;br /&gt;एक दिन पटना रूका औऱ फिर अगली सुबह पटना से रैय्याम के लिए निकल पड़ा, गंगा सेतु (पुल)जब बना था तब लोग इसे देखने के लिए बिहार भर से आते थे, नदी के इस पार से उस पार शान से खड़े इस पुल ने उस जमाने में दूरियों को जिस तरह कम दिया था वो लोगों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था, लेकिन वक्त बदला औऱ वो शान अब गर्दो गुबार में ढंक गया है। पुल जहां से शुरू होता है औऱ जहां खत्म होता है वहां तक घनघोर अराजकता के सिवा और कुछ नहीं नहीं, पुल कई जगह से टूट चुका है, थरथराते पुल पर सफर का ये अनुभव सिर्फ शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।&lt;br /&gt;पुल पार करने पर हाजीपुर और फिर टूटे-टाटे रास्ते में कभी पगडंडी पर गाड़ी तो कभी सड़क पर सफर बदस्तूर जारी रहा, मुजफ्फरपुर जब आया तो तो भी कहीं से नहीं लगा कि वाकई कुछ बदला है, ना कोई ट्रैफिक, ना ही सड़क, बहुत साल पहले गर्व से भरे वो बोल याद आए जब लोग मुजफ्फरपुर की तुलना ना जाने दुनिया के किन किन शहरों से करते थे। लेकिन सचमुच ऐसा लगा जैसे घड़ी की सुई यहां उलटी घूम रही है, &lt;br /&gt;वैसे पूरा किस्सा बताते बताते ये जरूर साफ कर दूं कि मकसद कहीं से बिहार के विकास की परख का नहीं है, &lt;br /&gt;इसे बस एक डायरी के चंद पन्ने समझ लीजिए, जिसपे आप कई बार यूं हीं बेमतलब कुछ लिख जाते हैं, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-5133399119769259953?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/5133399119769259953/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=5133399119769259953' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/5133399119769259953'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/5133399119769259953'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2010/03/1.html' title='दिल्ली टू रैय्याम वाया पटना दरभंगा-पार्ट-1'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-55988134835438751</id><published>2009-11-04T23:42:00.005+05:30</published><updated>2009-11-10T00:39:12.968+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>अपने-अपने दोजख</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/Svhn_5x366I/AAAAAAAAAE0/0h8uDa88u6E/s1600-h/DOJAKH2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/Svhn_5x366I/AAAAAAAAAE0/0h8uDa88u6E/s200/DOJAKH2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5402182100570336162" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;ख्वाबों के जंगल में भटकते हुए&lt;br /&gt;पीली धूप के किसी पेड़ तले&lt;br /&gt;उकताए, हारे, हांफते&lt;br /&gt;एक दूसरे को निहारते...&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;कुछ महीने पहले सैय्यद जैगम इमाम की कविता पर लिखते वक्त अहसास नहीं था कि पीली धूप के पेड़ों तले एक दोजख भी है...लेकिन नहीं वो भूल थी जिसका अहसास मुझे अब हो रहा है..सबके अपने अपने दोजख हैं....और जैगम इमाम का भी..टीवी की व्यस्त दुनिया के बावजूद जैगम का पहला उपन्यास हाथों में देखकर यकीन नहीं हुआ...उपन्यास पहला जरूर है लेकिन मैच्योरिटी के लिहाज से जैगम पहली नजर में बड़े बड़ों की कन्नी काटते नजर आते हैं...&lt;br /&gt;कहानी सीधी सी है...चंदौली जैसे छोटे से कस्बे का छोटा सा अल्लन...छोटे सपने-ललचाने वाले सपने...मचलने वाले अरमान...हहराती गंगा की लहरों में कूदने की ख्वाहिश...पतंगों औऱ कंचों में बसी दुनिया...सख्त अब्बा औऱ मुलायम मिजाज अम्मा की दुनिया..इस मासूम सी दुनिया में क्या कोई दोजख भी हो सकता है...क्या जन्नतों में भी नर्क की गुंजाइश है....ये सब सवाल जैगम चकित करने वाले भोलेपन के साथ उठाते हैं..ठीक उसी भोलेपन से जैसे वो पीली धूप के पेड़ों की तलाश में नज्म लिखते हैं....&lt;br /&gt;उपन्यास की पूरी कथा मुख्य किरदार अल्लन के इर्द गिर्द घूमती है...अल्लन को भी पीली धूप के पेड़ों की तलाश है...अपनी छोटी सी दुनिया को देखकर अल्लन दिन-रात हैरान होता है...खुद से सवाल करता है...लेकिन ट्रैजिडी यही है कि उसे जवाब नहीं मिलते...ये ट्रैजिडी मन को बेहद छूती है...सच कहें तो कई बार आंखों को गीली कर देती है...&lt;br /&gt;समाजशास्त्रीय खांचे के उत्तर आधुनिक विमर्श में उपन्यास कई बार सरहदों को तोड़ता दिखता है...कई बार ये सवाल उठते हैं कि क्या वाकई ऐसा मुमकिन है...क्या कस्बे के मामूली से लड़के का द्वंद्व ऐसा भी हो सकता है...लेकिन कहानी में अल्लन ही सबकुछ हो ऐसा भी नहीं है...क्योंकि आखिर में अल्लन के अब्बा की जो तस्वीर उकेरी गई है...वो औऱ भी झिंझोड़ने वाली है...वो पाठकों को औऱ भी भावुक करने वाली है....&lt;br /&gt;खैर कहानी का खुलासा औऱ करना मुनासिब नहीं होगा...लेकिन जैगम को इस बात के लिए जरूर बधाई मिलनी चाहिए कि उन्होंने चंदौली के मिजाज को जिस भाषा में बयान किया है वो वाकई दिल के करीब है...कई जगह भदेस है...लेकिन ये भदेसपन भाता है...अल्लन की गालियां दिल को छूती हैं...कई पुराने शब्द जेहन में ताजा हो जाते हैं...&lt;br /&gt;फेरन लवली (फेयर एंड लवली)..ये भी ऐसा ही एक लफ्ज है...&lt;br /&gt;उपन्यास वक्त के खांचे में कितना फिट बैठता है इसका इंसाफ तो आने वाले साल करेंगे...पर ठोकबजाकर अभी ये राय जरूर बनाई जा सकती है कि जैगम का ये उपन्यास एक मजबूत आगाज है...हवा के ताज़ा झोंके की तरह है...ठीक उसी तरह जैसे आप किसी महानगर की सीलन भरी हवा से खुले जंगल-गांव में पहुंचते हैं औऱ ठंडी हवा के झोंके से अजीब सी झुरझरी देह को पल भर के लिए थरथरा देती है...&lt;br /&gt;अल्लन भी आपको ऐसे ही सिहरने के लिए मजबूर कर देगा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक जानकारी--ये किताब राधाकृष्ण प्रकाशन ने छापी है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-55988134835438751?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/55988134835438751/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=55988134835438751' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/55988134835438751'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/55988134835438751'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='अपने-अपने दोजख'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/Svhn_5x366I/AAAAAAAAAE0/0h8uDa88u6E/s72-c/DOJAKH2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-2933483644587867757</id><published>2009-10-25T01:22:00.000+05:30</published><updated>2009-10-25T01:54:21.696+05:30</updated><title type='text'>....तब कलेजा फट गया</title><content type='html'>&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;भावुक नहीं हूं.....&lt;/span&gt;धर्म कर्म में दिलचस्पी भी बस स्वार्थ भर...गहरी मुसीबत में फंसे तो देवी-देवताओं को याद कर लिया....लेकिन फिर क्यों आंखें गीली हो गईं...गला रुंध गया...बरसों पीछे छूट गया वो नदी जैसा गंगासागर तालाब याद आया......घाटों पर छूटने वाले पटाखों की रोशनी और धमक जैसे ताजा हो गई....छठ के मौके पर घर की गहमागहमी याद आई औऱ ठेकुए की खुशबू भी कौंध गई....&lt;br /&gt;मनोज तिवारी से लेकर दूसरे गायकों के छठी मइया पर गाए गानों को सुनकर ऐसा क्यों लगा मानो कलेजा फट गया हो...मां हर साल छठ पर आने के लिए कहती रहीं....लेकिन शहर छूटा तो ऐसा कि कभी जा ना सका....अब तो मां ने बीमार रहने और उम्र के चलते छठ उस तरह से करना छोड़ दिया है....लेकिन छठ के मौके पर जाना फिर भी ना हो सका.....&lt;br /&gt;फिर आखिर वो कौन सी हूक थी कि जब मनोज तिवारी को छठी मईया के गाने गाते सुना तो रहा नहीं गया....क्यों याद आ गए वे दिन जब बचपन में छठ के लिए घाट को सजाने संवारने के लिए यार-दोस्तों के साथ घंटों बिताता था....सुबह टोकरी लेकर घाट पर जाना....भीड़ में मुश्किल से जगह बनाना....औऱ फिर सुबह के अर्घ्य के बाद घर लौटकर भरपेट प्रसाद खाना...औऱ मां के व्रत तोड़ने के लिए बने स्वादिष्ट खाने का छककर लुत्फ उठाना ....सब जैसे फ्लैशबैक की तरह आंखों के सामने डूबता उतराता रहा....छठ के ज्यादातर गानों को सुनें तो धुन एक सी लगती है....ये गाने तब उतने नहीं खींचते थे....लेकिन दस साल बाद मन की केमिस्ट्री में आखिर ऐसा क्या बदलाव आ गया कि छठी मइया के उन गानों को सुनकर पल भर के लिए लगा मानो मन विचलित हो गया हो....&lt;br /&gt;कहीं ऐसा तो नहीं कि आप जितने बड़े होते जाते हैं उतने ही पीछे के दिनों में गहरे डूबते जाते हैं.....खैर कई चीजों के लिए कोई दलील नहीं दी जा सकती...शायद इसके लिए भी मेरे पास कोई तर्क नहीं.....लेकिन हर चीज के लिए कोई वाजिब वजह हो ये भी तो जरूरी नहीं....आंखें हैं, छलक पड़ीं तो छलक पड़ीं....क्या फर्क पड़ता है कि आप भावुक हैं या नहीं.....कलेजा चाक हो गया तो हो गया....इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि जिंदगी के दूसरे तमाम मौकों पर आप कितने पत्थर दिल थे....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-2933483644587867757?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/2933483644587867757/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=2933483644587867757' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/2933483644587867757'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/2933483644587867757'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='....तब कलेजा फट गया'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-8888659606057559175</id><published>2009-06-14T03:00:00.000+05:30</published><updated>2009-06-14T04:07:34.296+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>हो सके तो माफ कर देना...</title><content type='html'>&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;हो सकता है आज सुबह आप जब चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहे हों तो ये खबर कहीं किसी कोने में दिख जाए....खबर का शीर्षक कुछ इस तरह से हो सकता है...सिर में चोट लगने से मजदूर ने दम तोड़ा....बहुत मुमकिन है कि तीन चार लाइनों की ये खबर अखबार में फिलर (खाली जगह भरने के लिए) की तरह इस्तेमाल की जाए...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खबर मामूली होगी और आप गौर करने की जहमत क्यों उठाएं...आखिर दिल्ली की दौड़ती भागती सड़कों पर हादसे होते रहते हैं लेकिन हममें से कितने ठहरते हैं...हो सकता है पल भर के लिए थमते हों...लेकिन फिर उचटती निगाह से जायजा लेकर...या तमाशबीनों की भीड़ में किसी एक से रुटीन सा सवाल कि भाई साहब क्या हुआ है...पूछकर ज्यादातर चलते बनते हैं...&lt;br /&gt;लेकिन ये वाकया ऐसा नहीं है...आप चलते भी बने तो ये आपका पीछा नहीं छोड़ेगा...&lt;br /&gt;क्योंकि उसकी लाश अब भी अस्पताल के सीलन से भरे सर्द मुर्दाघर में औपचारिकताओं का इंतजार कर रही होगी...क्योंकि ये पूरी कहानी जीते-जागते आदमी के चंद घंटों में दम तोड़ने की है....ये अस्पतालों की बेरहमी के उस भयावह सच की एक औऱ खौफनाक दास्तां है...जिससे हम सबका साबका आए दिन पड़ता रहता है...कैलाश नाम का एक मजदूर काम करते वक्त छत से नीचे गिरकर घायल हो जाता है...सिर में गंभीर चोट लगती है और उसे आनन फानन में रोहिणी के अंबेडकर अस्पताल ले जाया जाता है...वहां के डॉक्टर हाथ खड़े कर देते हैं....मामूली मरहम पट्टी करके दिल्ली के बड़े अस्पतालों में शुमार आरएमएल हॉस्पीटल रेफर कर दिया जाता है....आरएमएल में जख्मी मजदूर को भर्ती नहीं किया जाता...बल्कि बहानेबाजी कर दूसरे बड़े अस्पताल एलएनजेपी भेज दिया जाता है....एलएनजेपी अस्पताल में भी किसी डॉक्टर का दिल नहीं पसीजता....इस बीच, कैट के एंबुलेंस में स्ट्रेचर पर पड़े कैलाश की हालत लगातार बिगड़ रही होती है....दोपहर रात में तब्दील हो चुकी होती है...डॉक्टरों को भी छुट्टी चाहिए शनिवार की शाम है...वीकेंड्स बर्बाद क्यों करें....क्या फर्क पड़ता है कोई मरे तो अपनी बला से...कैलाश कोई वीआईपी नहीं.. अगर कुछ हो भी गया तो क्लास लगने का डर तो नहीं....&lt;br /&gt;लेकिन सारे डॉक्टर एक जैसे नहीं होते...उसी कैट की एंबुलेंस में अंबेडकर अस्पताल की एक महिला डॉक्टर भी घंटों से है...वो भी अपनी बिरादरी के दूसरे साथियों के बर्ताव से परेशान है...कुछ समझ नहीं आ रहा कि आखिर करे तो क्या करे....रात अब सुबह से कुछ घंटों की दूरी पर है.....लेकिन मौत कैलाश के सिरहाने खड़ी है....मौत औऱ कैलाश का फासला तेज़ी से कम हो रहा है....और फिर देखते ही देखते नीमबेहोशी की हालत में घंटों से जिंदगी के लिए जूझ रहा कैलाश आखिर मौत से हार जाता है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अंत में&lt;/strong&gt;--जिस कैलाश को जीते जी एलएनजेपी अस्पताल ने भर्ती नहीं किया...उसी के पार्थिव शरीर को कम से कम अस्पताल के मुर्दाघर में जगह मिल जाती है....कागजी कार्रवाई होनी है...पोस्टमार्टम होना है....&lt;br /&gt;आखिर कहूं तो क्या कहूं...लिखूं तो क्या लिखूं...सिवा इसके कि कैलाश हो सके तो माफ कर देना...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-8888659606057559175?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/8888659606057559175/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=8888659606057559175' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/8888659606057559175'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/8888659606057559175'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/06/blog-post_13.html' title='हो सके तो माफ कर देना...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-6049931910303418525</id><published>2009-06-10T02:07:00.000+05:30</published><updated>2009-06-10T02:58:15.595+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>टीवी, टीआरपी औऱ गरियाने का समाजशास्त्र !</title><content type='html'>&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;हाल के कुछ महीनों में खबरिया चैनलों की खूब खिंचाई हुई...कभी मुंबई हमलों के बहाने धोया गया तो कभी टीआरपी के पुराने डंडे को हथियार बनाकर पीटा गया....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हद तो तब हो गई जब टीवी की दुनिया में कुछ महीने या कुछ सालों पहले तक सक्रिय रहे पत्रकारों ने भी बड़ी बेरहमी से मनगढ़ंत कहानियां दुनिया के सामने पेश करने में जरा भी झिझक नहीं महसूस की...कंटेट पर सवाल उठाए गए...औऱ तमाम चैनलों की नीयत पर शक किया गया....इक्का दुक्का चैनलों को जरूर बेनिफिट ऑफ डाउट देकर छोड़ दिया गया औऱ दलील ये दी गई कि वो चैनल शोषितों औऱ वंचितों की बात करते हैं...किसानों-मजदूरों के हको-हकूक की बात उठाते हैं...असली इंडिया दिखाते हैं...हो सकता है...दिखाते भी हों...उन्हें गलत साबित करना मेरा मकसद नहीं...&lt;br /&gt;मकसद सिर्फ ये बताना है कि गरियाना इन दिनों फैशन बन गया है....किसी के बारे में ना आगे सोचो ना पीछे---जी भर के गाली दो...सुर्खियां खुद ब खुद मिल जाएंगी....मिसालें भरी पड़ी हैं...ऐसा ही कुछ रोज पहले हुआ था जब अचानक मुझे खुशवंत सिंह पर एक सज्जन की प्रतिक्रिया पढ़ने को मिली...खुशवंत की लानत-मलानत जिस छिछोरे अंदाज में की गई थी...उससे साफ था कि जिन सज्जन ने भी शब्दों की ये उलटी की थी...उन्होंने शायद ही खुशवंत को कभी पढ़ा होगा...शायद वो ये भी नहीं जानते होंगे कि खुशवंत सिर्फ अखबारों में रसीले कॉलम नहीं लिखते...उनका लिखा ऐसा बहुत कुछ है जिसकी अकादमिक काबिलियत पर बड़े बड़े आलोचक भी टिप्पणी करने से कतराते हैं....मैं खुशवंत सिंह को दुनिया का सबसे महान लेखक साबित करने की ना तो हैसियत रखता हूं...औऱ ना ही ये दावा कर रहा हूं...मैंने ये वाकया सिर्फ ट्रेंड बताने के लिए आपके सामने पेश किया है....&lt;br /&gt;इसी तरह टीवी और टीआरपी की बात करें....भूत-प्रेत-क्रिकेट-बॉलीवुड से सने कंटेंट की बात करें तो यकीनन आलोचना की गुंजाइश हर माध्यम में है और उतने के हकदार खबरिया चैनल भी हैं....इसके लिए ना तो मैं कोई सफाई पेश करना चाहता हूं औऱ ना ही इन्हें जायज ठहराने के लिए दलील दे रहा हूं....लेकिन गरियाने के फैशन में मशगूल भाई-बंधुओं को ये जरूर याद दिलाना चाहता हूं दर्शक जिसे चाहता है उसे देखता है....समय से बड़ा सेंसर बोर्ड कोई नहीं होता क्योंकि इसकी कैंची बड़ी बेरहम होती है....भूत-प्रेत अब ज्यादातर चैनलों से हवा हो चुके हैं....ऊटपटांग खबरें भी अब ज्यादातर चैनलों पर हाशिये में चली गई हैं....रहा सवाल क्रिकेट का तो अगर कोई खेल देश में सबसे ज्यादा देखा जाता है...जिसके हीरो अपने चाहने वालों की नजर में भगवान से कम नहीं...तो उनकी खबरें दिखाकर टीवी चैनल कौन सा गैरजमानती अपराध कर देते हैं...ये समझ से परे है!&lt;br /&gt;खबरिया चैनलों से पुराना अखबारों का इतिहास है...लेकिन क्या एक भी अखबार का नाम जेहन में आता है जो बॉलीवुड की गर्मागर्म खबरों को छौंक लगाकर नहीं पेश करता हो...आखिर शीतल मफतलाल की गिरफ्तारी और फिर जमानत रातोंरात राष्ट्रीय महत्व की खबर कैसे बन जाती है! लेकिन तब तो आप खामोश हैं....लेकिन पड़ोसी मुल्क जहां की हर छोटी बड़ी घटना का असर हमारे देश पर हो सकता है...वहां तालिबान की करतूतों पर चैनलों ने दिखा दिया तो मानो पहाड़ टूट पड़ा हो....&lt;br /&gt;...खैर अगली बार आप टीआरपी के बहाने खबरिया चैनलों की क्लास लेने में जुटे हुए हों तो जरा खुद के अंदर भी जरूर झांकिएगा....सिर्फ सुर में सुर मिलाकर गरियाने से लोकतंत्र नहीं मजबूत होता....आप दर्शक हैं...रिमोट उठाइये...औऱ बदल दीजिए वो चैनल जो आप नहीं देखना चाहते...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-6049931910303418525?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/6049931910303418525/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=6049931910303418525' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/6049931910303418525'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/6049931910303418525'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/06/blog-post_09.html' title='टीवी, टीआरपी औऱ गरियाने का समाजशास्त्र !'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-5729072381549352501</id><published>2009-06-07T03:32:00.000+05:30</published><updated>2009-06-07T04:20:17.541+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>अजीब दास्तां है ये...</title><content type='html'>&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;सोचा था, आज भी नहीं लिखूंगा...लेकिन ऐसा हो ना सका...सो एक बार फिर हाजिर हूं....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जून की तपती दुपहरियों के इस जानलेवा मौसम में दिल्ली अक्सर लुटी-पिटी और बेदिल सी दिखती है....तब भी ऐसा ही था...सुबह से गर्म हवा के थपेड़े औऱ चढ़ते सूरज के साथ धूप का मिजाज उन दिनों भी इतना ही तीखा हुआ करता था...नॉर्थ कैंपस में एडमिशन के लिए लड़के लड़कियों की फौज तब भी पसीने से तरबतर हैरान-परेशान कॉलेज दर कॉलेज चक्कर काटती थी...आज भी ऐसा ही माहौल दिख जाएगा....&lt;br /&gt;-जब जनवरी में गली करतार सिंह पर आखिरी पोस्ट लिखी थी....तब भी ब्लॉग की दुनिया लिक्खाड़ों से भरी-पूरी थी....गली-मुहल्ले-सड़कें-बस्ती-टोले गुलजार थे ...आज भी है...&lt;br /&gt;-तो क्या सबकुछ यूं ही चलता रहता है! बदलता कुछ भी नहीं---या जो बदलता दिखता है---वो सब धोखा है--माफ कीजिए-बदलाव के दर्शन में आपको उलझाना कतई मकसद नहीं...मैं तो मौसम के बेरहम अंदाज को बयां कर रहा था....जो सुबह से ही कहीं निकलना मुहाल कर देता है....&lt;br /&gt;खैर ये दास्तां अजीब है....इसलिए कृपया ओर-छोर तलाशने की कोशिश नहीं कीजिएगा...ये पता नहीं कहां शुरू हुई औऱ ना जाने कब खतम होगी....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-5729072381549352501?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/5729072381549352501/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=5729072381549352501' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/5729072381549352501'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/5729072381549352501'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='अजीब दास्तां है ये...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-6492882578873559575</id><published>2009-01-25T02:20:00.000+05:30</published><updated>2009-01-25T04:11:17.518+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>इस धंधे में कोई अजातशत्रु नहीं!!!</title><content type='html'>&lt;strong&gt;नवभारत टाइम्स, दिल्ली के एक्जीक्यूटिव एडीटर और वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कुमार अब इस संस्थान के हिस्से नहीं रहे। सूत्रों के अनुसार 58 वर्ष की उम्र पूरी हो जाने पर उन्होंने संस्थान से रिटायरमेंट ले लिया।&lt;/strong&gt; ---&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;हाल ही में एक वेबसाइट पर प्रकाशित खबर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;खबर पढ़ते ही पता नहीं कब मन उन दिनों में भटकने लगा जब करिअर की शुरुआत कर रहा था....वे दिन निजी तौर पर मेरे लिए कला औऱ साहित्य के नाम पर इधर-उधर मगजमारी से ज्यादा कुछ नहीं थे...शाम का वक्त मंडी हाउस में गुजरता और दोपहर दोस्तों के साथ लंबी चौड़ी प्लानिंग में....ये वो दिन भी थे जब दो वक्त खाने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ती...गली से बाहर निकलते औऱ कल्लू पहलवान (वाकई उस दुकानदार का यही नाम था) के यहां जाकर बढ़िया बिल्कुल गाढ़ी लस्सी पीते...जिसमें पानी की एक बूंद नहीं होती...उसके पहले पूरी-सब्ज़ी का मजा लेना नहीं भूलते...पैसे रहे तो दे दिए नहीं रहे तो कोई बात नहीं कल तो मिल ही जाएंगे...घर लौटते वक्त ठेले (रेहड़ी) पर टूटे हुए केले दो चार खरीद लिए...ताकि इमरजेंसी में काम आ सकें.....हां सिगरेट (बड़ी वाली गोल्डफ्लेक ) का स्टॉक खरीदना हममें से कोई नहीं भूलता....(हालांकि अंबुमणि रामदौस की सख्ती से बहुत साल पहले सिगरेट पीनी छोड़ चुका हूं....पता नहीं क्यों सिगरेट पीना मुझे हमेशा बेवजह लगा....सिगरेटखोरी में कई लोगों को मज़ा आता है....पर मुझे कभी कोई स्वाद नहीं लगा)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;ऐसे ही फाकामस्ती के दिनों में जब भविष्य की फिक्र सताने लगी.....तो एक रोज बस पकड़कर नोएडा चला गया...गोलचक्कर पर उतरा औऱ फिर वहां से सेक्टर आठ के लिए रिक्शा लेकर एक अखबार के दफ्तर पहुंच गया....न्यूज रूम के नाम पर रोमानी हो जाएं ऐसा कुछ भी उन दिनों नहीं था.....एक बड़ा सा हाल...दीवारों का प्लस्तर जहां तहां से उधड़ा हुआ....जिसमें बीच का हिस्सा खाली औऱ किनारे किनारे डेस्क....(डेस्क के नीचे डस्टबीन....जो बाद में पता चला कि पीकदान बन गए हैं) काम करने वाले लोगों ने उचटती निगाहों से देखा....कोई नया है सोचकर ज्यादा भाव ना मिलना था औऱ ना ही मिला....मई-जून का महीना रहा होगा....धूप ऐसी जबरदस्त कि पसीने छूट गए....मन ही मन ये भी सोचा इससे अच्छा तो घर पर एक नींद ही मार लेता....खैर वहीं हॉल के बाहर रिसेप्शन नुमा जगह पर बैठ गया....क्योंकि प्रदीप जी अभी तक आए नहीं थे.....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;थोड़ी देर बाद आए....उनसे मुलाकात हुई....मेरा टेस्ट लिया गया....(कुछ पन्ने अनुवाद कराए....इंग्लिश से हिंदी) ऊपरवाले की दया से मेरा अनुवाद उन्हें बेहतर लगा....औऱ इस तरह मिल गई मुझे जिंदगी की पहली नौकरी.....जब लौट रहा था तब सूरज ढल रहा था....उस दिन मुझे आसमान जितना खूबसूरत लगा उतना कभी नहीं लगा....अजीब सी खुशी....नौकरी दो हज़ार की मिली थी...दिल्ली जैसे शहर में दो हजार रुपये की पगार &lt;span class=""&gt;1995में&lt;/span&gt; कम नहीं थी....नहीं कुछ से अच्छा था कि चलो कुछ तो आ रहा है...घर वालों के लिए भी इत्मीनान दिलाना जरूरी हो चला था....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;खैर इस तरह प्रदीप जी से मेरा साबका पड़ा...प्रदीप जी से सीखने के लिए हजारों चीजें थीं...भाषाई झोल उन्हें कतई गवारा नहीं था....अनुवाद को लेकर बेहद आग्रही...अगर किसी ने पीटीआई की कॉपी का बंटाधार किया तो भरे न्यूज़रूम में फजीहत से उसे कोई बचा नहीं सकता....लेकिन इतने साल इस धंधे में गुजारने के बाद ये जरूर कहना चाहूंगा कि प्रदीप जी का खुद का अनुवाद भी बेहद सधा हुआ...सलीकेदार था...रौ में लिखें तो कविता से कम नहीं....खासतौर से दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के मामले में जज प्रेम कुमार का फैसला आया था....उस फैसले में जज ने गीता या किसी और धर्मग्रंथ के किसी श्लोक का हवाला दिया था....फर्ज कीजिए कि श्लोक संस्कृत में रहा होगा....जज ने अंग्रेजी में फैसला लिखा होगा...श्लोक का अंग्रेजी में अनुवाद किया होगा....औऱ फिर खबर में इसी का प्रदीप जी ने हिंदी अनुवाद किया तो मानो कविता रच डाली....(शीर्षक कुछ इस तरह से था---काल कर देता है सबका संहार) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;उन्हीं प्रदीप जी के रिटायरमेंट लेने की खबर पढ़ी तो यकीन नहीं हुआ...क्योंकि अखबारों में मंदी के नाम पर जो कत्लेआम मचा हुआ है...उसने अंदर से खोखली पर बाहर से चमकीली दिखने वाली इस दुनिया के शीशमहल को छन्न से तोड़ दिया है....बड़े बड़े नाम मिनटों में दफ्तर से बेदखल कर दिए गए....ऐसे में कब किसके साथ क्या हो जाए कहना मुश्किल है.....जहां तक प्रदीप जी की बात है उन्होंने सैकड़ों लोगों के साथ काम किया.... कई को नौकरी दी....कई की नौकरी ली....अखबारों से लेकर टीवी सभी माध्यमों में मंजे...और बहुतों को मांजा.... हो सकता है कईयों का तजुर्बा उनके साथ अच्छा नहीं रहा होगा....कईयों की नज़र में वो विलेन भी रहे होंगे....लेकिन मैंने उनके जिस पहलू को जाना....जिसके कारण उनको अपने गुरु की तरह माना...वो पहलू मन के किसी कोने में हमेशा बरकरार रहेगा.....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;वैसे भी ये धंधा बड़ा निर्मम है इसमें कोई अजातशत्रु नहीं होता..... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-6492882578873559575?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/6492882578873559575/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=6492882578873559575' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/6492882578873559575'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/6492882578873559575'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/01/blog-post_24.html' title='इस धंधे में कोई अजातशत्रु नहीं!!!'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-3128486955093128458</id><published>2009-01-12T01:02:00.000+05:30</published><updated>2009-01-12T01:57:26.524+05:30</updated><title type='text'>पर कितना मुश्किल है भूल जाना...</title><content type='html'>सालों पहले जब दिल्ली में रहने के बाद पटना लौटा था तो वहां का रेलवे स्टेशन विचित्र लगा था...क्योंकि आंखों में तब नई दिल्ली का लंबा-चौड़ा स्टेशन बसा था जिसमें कई प्लेटफॉर्म औऱ दिन-रात गुजरती ट्रेनों से उतरते मुसाफिरों का कभी ना खत्म होने वाला रेला सिर को चकरा देता था...&lt;br /&gt;सालों पहले जब धूमिल और मुक्तिबोध को पढ़ता था....रातें गोरख पांडे औऱ सर्वेश्वर की कविताओं को पढ़ने में गुजर जाती थीं और सुबह कभी ग्यारह बजे से पहले नहीं होती थी...तब और अब के दौर में बहुत कुछ बदल चुका है....दिल्ली का मौसम बदल गया है और बदला है सड़कों का हुलिया...आबादी बढ़ी है...और अब बारिश के दिनों में भी बारिश का इंतजार रहता है....ठंड के दिनों में कंपा देने वाली ठंड अब क्यों नहीं पड़ती, नहीं मालूम...अंदर झांकता हूं तो ऐसा लगता है मानो दिल्ली का नक्शा और मौसम ही नहीं...अपना खुद का मिजाज भी बदल गया है...&lt;br /&gt;लौटता हूं कई साल पीछे तो याद आता हैं वो मौसम जब बारिश के दिनों में ब्लूलाइन की ५०१ नंबर की बस पकड़ी थी...बूंदा बांदी हो रही थी...सड़कें भीग चुकी थीं...और कपड़े सील से गए थे...दिल्ली तब अजनबी लगनी बंद हो चुकी थी...लेकिन आंखें नई चीज को देखकर चौंकने लेकिन छिपाने वाली कोशिश तब भी करती थीं....पर तब तक मैं इस अजनबी से शहर को अपना चुका था...अजनबियों की भीड़ का हिस्सा बन चुका था....और ये बेतुका ख्वाब भी देखता था कि एक दिन पूरे शहर को फतह कर लूंगा.....&lt;br /&gt;उस भीगे दिन जब बस आखिरी स्टॉप पर उतरी थी तब वहां से बरफखाने की बस पकड़ी औऱ पूछता-पाछता पहुंच गया सब्ज़ीमंडी....&lt;br /&gt;वो इलाका जहां पहुंचकर ऐसा लगा- मानो इस दिल्ली का कनाट प्लेस की दिल्ली...हुमायूं रोड-शाहजहां रोड और फीरोजशाह रोड जैसे इलाकों से कोई रिश्ता ही नहीं....उसी सब्जी मंडी में एक था इंदिरा मार्केट जहां बीजों और पेस्टिसाइड्स की दुकानें थीं...औऱ इन्हीं दुकानों के पीछे से गुजरती थीं कई गलियां....जिनमें से एक थी गली करतार...वही गली जो मेरे ब्लॉग का नाम है....वही गली जो आज भी मन के कबाड़खाने में कहीं चोरदरवाजों के पीछे छिपी है&lt;br /&gt;बारिश तेज़ हो चुकी थी...दुकानों के छज्जों में बारिश से खुद को छिपता-छिपाता....किसी तरह वहां पहुंचा जहां मुझे जाना था....बारिश के मौसम में बादलों से ढंके आसमान का घुप्प अंधेरा बड़ा अजब होता है...ऐसा ही अंधेरा उस रोज भी था...सारे सामान के साथ गली करतार के उस मकान में पहुंचा जहां औऱ भी कई साथी रहते थे...कुछ थे जो डीयू में पढ़ रहे थे....तो कुछ थे जो ब्रिटिश स्कूल ऑफ लैंग्वेज में अंग्रेजी सीख रहे थे...उनमें से हरेक का सपना दिल्ली फतह करने का ही था....लेकिन जो दिल्ली मुगलों से लेकर तमाम राजे-महराजे और फिर अंग्रेजों की नहीं हो सकी...जिन्होंने कई बार इसपे जीत हासिल की औऱ आखिर में हार गए...वो हमारी क्या होनी थी...सो नहीं हुई....&lt;br /&gt;लेकिन मुझे जरूर ऐसा माहौल मिल चुका था...जहां मैंने जिंदगी के कई अंधेरे-उजाले देखे...कविताओं का चस्का लगा...धूमिल की कविताएं कंठस्थ हो गईं औऱ मुक्तिबोध को आर-पार पढ़ डाला....निराला तब भी अच्छे लगते थे...औऱ आज भी...&lt;br /&gt;खैर...नॉस्टैलजिया अक्सर नशे की तरह होता है...आप जितना डूबेंगे...डूबते चले जाएंगे....&lt;br /&gt;आज की ये पोस्ट भी इसी की उपज है&lt;br /&gt;क्योंकि भूलना मुश्किल होता है&lt;br /&gt;बहुत मुश्किल...&lt;br /&gt;अगला किस्सा फिर कभी....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-3128486955093128458?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/3128486955093128458/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=3128486955093128458' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/3128486955093128458'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/3128486955093128458'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/01/blog-post_11.html' title='पर कितना मुश्किल है भूल जाना...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-798552487266863458</id><published>2009-01-09T03:10:00.000+05:30</published><updated>2009-01-09T03:33:39.408+05:30</updated><title type='text'>इस शोकगीत में कोई नायक नहीं!</title><content type='html'>आमतौर पर शोकगीत महानायकों के लिखे जाते हैं...गाए जाते हैं...उनके नहीं जिनका गुजरना आपके हमारे जीवन को कहीं से रत्ती भर भी नहीं छूता....&lt;br /&gt;लेकिन उस तस्वीर में ऐसी बात नहीं थी....तस्वीर अखबारों मे छपी थी....वो जो टाइम्स के एशियाई हीरो की लिस्ट में कभी शुमार था...उसी का पार्थिव शरीर पटना में उस सीली सर्द सुबह कमरे में फर्श पर रखा था...सिरहाने टेलीफोन...पास में बिलखती पत्नी और बच्चे... और एकआध रिश्तेदार....&lt;br /&gt;तस्वीरें सच बयां करती हैं...औऱ कभी-कभी समय का ठंडा औऱ भयावह चेहरा दिखाती हैं...पता नहीं क्यों उस सुबह ये तस्वीर भी मुझे कुछ ऐसा ही अहसास करा गई।&lt;br /&gt;ये तस्वीर गौतम गोस्वामी की थी....आईएएस ऑफिसर गौतम गोस्वामी...एक ऐसा शख्स जिसके करिअर की शुरुआत सुनहरी हुई, लेकिन अंत बेहद त्रासद।&lt;br /&gt;पटना के पूर्व डीएम गौतम गोस्वामी...जिन्होंने एक समय आडवाणी को भरी सभा में वक्त की पाबंदी याद दिलाते हुए रैली खत्म करने पर मजबूर कर दिया था...लेकिन यही तेज़ तर्रार अफसर जब बाढ़ घोटाले में घुटनों तक सन गया तब बेआबरू होकर नौकरी छोड़नी पड़ी...हालांकि बाद में नौकरी में वापसी हुई....लेकिन तब तक गौतम गोस्वामी के लिए जिंदगी के मायने बदल चुके थे....सुनहरा करिअर पीछे छूट चुका था...और पैनक्रियाटिक कैंसर हर पल जिंदगी को निगल रहा था....&lt;br /&gt;गौतम गोस्वामी की ये तस्वीर महज तस्वीर नहीं थी....ये वक्त का बड़ा ही अजीबोगरीब हिसाब था...जिसकी उधड़ती परतों में ये भयानक सच झांक रहा था कि कैसे कोई हीरो अचानक खलनायकों में तब्दील हो जाता है....आखिर क्या हालात रहे होगें....क्या भ्रष्ट होती राजनीतिक व्यवस्था या फिर इंसान का खुद का अपना लालच...&lt;br /&gt;इन वजहों पर जाने का कोई मतलब नहीं क्योंकि गौतम गोस्वामी इन तमाम दलीलों, तर्कों और सवाल-जवाबों को पीछे छोड़ चले गए हैं....बाकी बच गई है तो वो तस्वीर जिसमें पटना की उस सीलन भरी सुबह का सर्द कर देने वाला रोजनामचा दर्ज था...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-798552487266863458?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/798552487266863458/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=798552487266863458' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/798552487266863458'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/798552487266863458'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/01/blog-post_08.html' title='इस शोकगीत में कोई नायक नहीं!'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-9095460956235855413</id><published>2009-01-08T01:26:00.000+05:30</published><updated>2009-01-08T02:02:44.766+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>जरा उन 53000 लोगों के बारे में भी सोचिएगा!!!</title><content type='html'>जो कल तक अभेद्य किले दिखते थे वो सेकेंडों में रेत के महल की तरह भरभरा कर गिर पड़े...जिनकी नींव सबसे ठोस मानी जाती थी...वहां एक ऐसी अंधी सुरंग निकली जिसमें लाखों निवेशकों का भरोसा दफन हो गया....लेकिन फिक्र यहां नहीं है---बाज़ार है तो घाटा भी होगा...मंदी के इस दौर में ना जाने कितने डूब गए औऱ कई वैसे भी हैं जो बन गए...&lt;br /&gt;यहां चिंता उन तिरेपन हजार लोगों की है जो कल तक ऊंची तनख्वाहों पर जीते थे....लेकिन सत्यम के असत्य ने झटके भर में जिनका आशियाना तिनकों की तरह बिखेर दिया...आईटी सेक्टर में नौकरियों के लिए कुछ ही घंटों में बत्तीस हजार से भी ज्यादा अर्जियां इंटरनेट के जरिए नौकरी मुहैया कराने वाली कंपनियों की साइट पर पहुंच गईं...&lt;br /&gt;हमारे दौर का इससे भयावह सच और कुछ नहीं हो सकता....महंगी पढ़ाई करने के बाद किसी ब्लूचिप कंपनी में और वो भी सत्यम जैसी नामी गिरामी हो तो फिर कहने क्या...लेकिन सुकून का अहसास भी कभी कभी कितना फर्जी होता है---ये जरा पूछना हो तो उन तिरेपन हजार लोगों के मन में भी झांककर देखिएगा जो सत्यम में काम करते थे....&lt;br /&gt;आखिर गलत कहां हुआ....सबकुछ तो ठीक था...सबसे बढ़िया मानी जाने वाली नौकरी...सुरक्षित भविष्य औऱ अपने अपने आस -पड़ोस में वे सब रोलमॉडल भी तो रहे होंगे...तनख्वाह अच्छी तो घर भी अच्छा ले ही लिया होगा...और अच्छा घर लिया हो तो ईएमआई भी अच्छी कटती ही होगी...बड़ी गाड़ियों को बड़ी करने की होड़ में भी कई जुटे हुए होंगे....लेकिन चंद झूठ ने एक साथ हजारों कर्मचारियों की जिंदगी को दांव पर लगा दिया....&lt;br /&gt;आप अगर बड़ी जगहों पर काम करते हों...तो आलीशान दफ्तरों में बैठने के बाद कई बार हकीकत की सख्त जमीन से वास्ता छूट सा जाता है...ऐसा भी होता है जब आप अपनी बनाई ही दुनिया में जीने लगते हैं....लेकिन यही दुनिया जब मुट्ठी से फिसलने लगे तो इससे क्रूर मजाक कुछ और नहीं हो सकता...सत्यम के उन तिरेपन हजार साथियों के साथ भी यही हुआ....&lt;br /&gt;खैर संकट की इस घड़ी में हम कर भी क्या सकते हैं....सिवाय इसके कि पूरी आस्था के साथ उनके लिए प्रार्थना करें....&lt;br /&gt;इसलिए हो सके तो तो आप भी रोजमर्रा की भागती-दौड़ती जिंदगी में फुर्सत के कुछ पल संजोकर जरा उनके बारे में सोचिएगा....उन तिरेपन हजार लोगों के बारे में जरूर सोचिएगा....क्योंकि ये सच कल होकर किसी का भी हो सकता है....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-9095460956235855413?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/9095460956235855413/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=9095460956235855413' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/9095460956235855413'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/9095460956235855413'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/01/53000.html' title='जरा उन 53000 लोगों के बारे में भी सोचिएगा!!!'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-4272276626655195315</id><published>2009-01-06T02:13:00.000+05:30</published><updated>2009-01-06T02:57:52.331+05:30</updated><title type='text'>पीली धूप का पेड़ !</title><content type='html'>&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;ख्वाबों के जंगल में भटकते हुए&lt;br /&gt;पीली धूप के किसी पेड़ तले&lt;br /&gt;उकताए, हारे, हांफते&lt;br /&gt;एक दूसरे को निहारते...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;-सैय्यद जैगम इमाम की कविता का एक अंश&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीली धूप के पेड़ आपने कहीं देखे हैं....शायद नहीं...इन दरख्तों को आप महसूस कर सकते हैं...हकीकत में नहीं बल्कि ख्वाबों में.....अपने साथी जैगम इमाम की कविता जब सुन रहा था तब मन ही मन यही सोचा....&lt;br /&gt;चटख रंग आपको अपनी ओर खींचते हैं जिसमें हम मन के धूसर....बुझे रंगों को कहीं दफन कर देते हैं....चाहे हरा हो या पीला या फिर नीला....कभी कभी लाल भी...ये कुछ ऐसे रंग हैं जो अक्सर हमें अपने ख्वाबों को सतरंगा बुनने के काम आते हैं.....&lt;br /&gt;बचपन के दिनों में कभी किसी राइम की बुक में या किस्से कहानियों की किताबों में छोटे-छोटे दरख्त देखता था----पन्नों पर छपा आसमान और इस पर टंके तारे-चांद देखता था तो कई बार मन इतना ललचाता था.. मानों इन्हें छू लूं....अजब सी मायावी और सम्मोहक दुनिया थी जिसके घुमावदार रास्तों में भटकता रहता था....छोटे छोटे ख्वाब---बेसिर-पैर की हसरतें---अजब सा तिलिस्म....जासूसी उपन्यासों से लेकर वेताल की कहानियों, राजा-रानी की दुनिया से लेकर चंदामामा...औऱ भी ना जाने कितना कुछ...&lt;br /&gt;आज जब पलटकर देखता हूं तो कभी हंसी आती है... कभी लगता है कि आप जिन मोड़ों से गुजर चुके होते हैं वो उस वक्त बेहद घुमावदार भले ही लगे हों पर अब कितने आसान महसूस होते हैं...&lt;br /&gt;लेकिन तलाश तब भी होती थी...जो कभी पूरी नहीं होती थी...तलाश अब भी है जो पता नहीं कब पूरी होगी....&lt;br /&gt;जो ख्वाब कल बड़े लगते थे आज वो मामूली लगते हैं....जो हसरतें आज बड़ी लग रही हैं शायद कल इनके बारे में सोचने की फुर्सत भी ना मिले....&lt;br /&gt;चाहे जो भी हो पर ये तय है कि ख्वाबों के जंगलों में यूं ही भटकने का मज़ा ही कुछ और है...खासकर तब जबकि उकताए थके हारे किसी पेड़ के नीचे हांफते सुस्ता रहे हों...&lt;br /&gt;ये रोमांच कई बरस पहले भी खींचता था&lt;br /&gt;औऱ आज भी खींचता है&lt;br /&gt;पीली धूप के उस पेड़ की तलाश तब भी थी&lt;br /&gt;औऱ अब भी है&lt;br /&gt;क्या पता किसी दिन वाकई मुझे मिल जाए पीली धूप का वो पेड़!!!&lt;br /&gt;आइये दुआ करें!!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-4272276626655195315?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/4272276626655195315/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=4272276626655195315' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/4272276626655195315'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/4272276626655195315'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/01/blog-post_7439.html' title='पीली धूप का पेड़ !'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-6298974873160077995</id><published>2009-01-06T00:02:00.000+05:30</published><updated>2009-01-06T00:26:58.763+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जॉन डीकोस्टा की डायरी'/><title type='text'>जाइए भाई चीरा लगवा के आइए...</title><content type='html'>&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;जॉन डीकोस्टा की डाय़री के इस पन्ने के लेखक हैं रवि बुले&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;strong&gt;रवि बुले का परिचय&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;-हिंदी में नई कहानी के नए दौर की नींव मजबूत करने में रवि बुले शिद्दत से जुटे हुए हैं.....फिलहाल मायानगरी में सक्रिय...फिल्मों का नया व्याकरण गढ़ने की बेचैनी इन दिनों उनकी पहली प्राथमिकता है...देश के कई नामी गिरामी अखबारों से जुड़े रहे...सूत्रधार जॉन डीकोस्टा के विशेष आग्रह पर बुले जी ने वृतांत का ये अध्याय जोड़ा है....आगे भी गली करतार के पाठकों को बुले जी की लेखनी का जादू देखने को मिलता रहेगा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;ul&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;जॉन डीकोस्टा की डायरी का पेज नंबर-7&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ul&gt;अन्नू बाबू अपने आस-पास एक कोहरा-सा लिए चलते थे!! ...और अकसर उसमें गुम हो जाते थे। ये उनके व्यक्तित्व का अनूठा रहस्य था। कभी कमरे में बैठे-बैठे। कभी ठंड या बे-मौसम रजाई में दुबके। किसी गर्भस्थ शिशु-सा अपने पैरों को छाती से सटाए। मगर उनके जूते रजाई में से सदा झांकते रहते। ऐसा लगता कि मानो ये आदमी रजाई के बाहर अपने जूते छोड़ कर भीतर किसी गम भरी दुनिया में खो गया है!! परंतु कभी यह भी लगता कि अन्नू बाबू ने ये जूते दुनिया के मुंह पर दे मारने के लिए छोड़े हैं। क्या अन्नू बाबू अपने कोहरे में से वापस लौट कर, उन्हें सताने वाली 'जॉर्ज-बुशी-दुनिया" के मुंह पर जूते मारेंगे? हालांकि अन्नू बाबू ने अपना "क्षत्रियत्व" कभी जाहिर नहीं किया। तब भी नहीं, जब वे उस रोज सुबह कोहरे को चीरते हुए लौटे और सी-13 के दरवाजे पर डॉक्टर साहब से दरवाजे पर उनकी मुठभेड़ हुई!! अखबार के तहखाना-दफ्तर में अन्नू बाबू हर शाम खुद को अगर थोड़ा घिसने के लिए जाते थे, तो ये उनकी मजबूरी थी। गिरगिटिया आंखों वाले बॉस के सामने रंग बदलना अन्नु बाबू ने सीख लिया था! यह सहज ही हुआ या यह उनके भीतर छुपा एक और रहस्य था? अन्नू बाबू रंग बदलने का अपना रहस्य खैनी की पीक के साथ दफ्तर के डस्टबीन में ही उगल आया करते थे। अन्नू बाबू अपने रहस्यों को सात परदों में छुपा कर रखते थे। मगर, डॉक्टर साहब में हर बात को बेपरदा करने की जिद थी!! आंगन की गुनगुनी गुलाबी धूप में सदा चलने वाली दोनों की इसी रस्साकशी में एक दिन यह सवाल पेश हो गया कि क्या अन्नू बाबू "वृषण-जल-रोग" के शिकार हो गए हैं? डॉक्टर साहब ने सार्वजनिक रूप से अन्नू बाबू के सामने गर्जना की... जाइए भाई इसमें चीरा लगवा के आइए...।अन्नु बाबू सन्न और निरुत्तर!! ये तो पहले से साफ था कि जिस तहखाने में अन्नू बाबू नौकरी बजाते थे, वो अखबार का वृषण था। उसमें जल की सी ठंडक सदा मौजूद रहती थी। जिसे तहखाने में मजूरी करने वाला हर व्यक्ति मफलर-सा लपेटे रहता था। अगर कभी किसी ने ठंड को लेकर शिकायत की और अपना तापमान बढ़ाया, तो गिरगिटिया आंखों वाला बॉस उसे सामने की सीढिय़ां दिखा देता! सभी सीढिय़ां स्वर्ग को तो नहीं जाती!! ...और बारह महीनों, चौबीस घंटे ठंड खाकर भी लोग जिंदा रहते हैं!! अन्नू बाबू भी जिंदा थे। "वृषण-जल-रोग" के साथ!! जिन दिनों अन्नू बाबू कुहासे को चीरते हुए कहीं चले गए थे, तब तमाम चर्चाओं के बीच एक चर्चा यह उठी कि कहीं वे वृषण में चीरा लगवा कर समस्या से छुटकारा पाने तो नहीं चले गए? नौकरी में लगातार परेशान होते अन्नु बाबू शिद्दत से महसूस करने लगे थे कि तहखाना अखबार का वृषण है। गिरगिटिया बॉस अखबार मालिकों का वृषण है। मगर वे अपने वृषण से हैरान थे। कभी कभार वे क्रोध में आकर एक साथ इन सबसे निजात पाने को उतावले हो जाते। परंतु उनके भीतर एक संत भाव भी था। जो तस्वीरों में गांधी जी के चेहरे पर साफ पढ़ा जा सकता है। अन्नु बाबू को इतना क्रोध कभी नहीं आया कि वे अपने जीवन में मौजूद तमाम वृषणों पर कोई निर्णय ले पाते। एकांत में विचार करते हुए वे अकसर अहल्या की तरह पत्थर के बन जाते...!क्या अन्नू बाबू किसी शाप से ग्रस्त थे...?ज्यादातर पुराण कहते हैं कि गौतम ऋषि अपनी पत्नी अहल्या और उसे बहका कर बलात्कार करने वाले इंद्र को शाप देकर किसी कोहरे में खो गए थे! परंतु लिंग पुराण में दर्ज इस कथा में थोड़ा ट्विस्ट है। यहां गौतम इंद्र को सिर्फ शाप नहीं देते। बल्कि क्रोध में आकर उसे जमीन पर पटकते हैं और उसके वृषण उखाड़ लेते हैं!! गौतम के पौरुष की गवाही सिर्फ इसी पुराण में है। एकांत में विचार करते हुए अहल्या-से बन जाने वाले अन्नु बाबू के पौरुष की गवाही क्या किसी किस्से में आएगी...? जॉन डीकोस्टा की डायरी के आगे के पन्नों में इस पर से परदा उठेगा...&lt;br /&gt;जॉन डीकोस्टा की डायरी&lt;br /&gt;पेज संख्या-7&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-6298974873160077995?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/6298974873160077995/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=6298974873160077995' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/6298974873160077995'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/6298974873160077995'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/01/blog-post_05.html' title='जाइए भाई चीरा लगवा के आइए...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-5440855468024730608</id><published>2009-01-04T00:43:00.000+05:30</published><updated>2009-01-04T01:36:23.582+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जॉन डीकोस्टा की डायरी'/><title type='text'>...और कोहरे को चीरता वो आ गया !</title><content type='html'>&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;पिछले पन्नों पर&lt;/span&gt;: आपने अन्नू बाबू का किस्सा पढ़ा...उनकी शख्सीयत के बारे में जो कुछ मुझसे बन सका...पूरी शिद्दत के साथ बयान करने की कोशिश की...लेकिन बहुत कुछ ऐसा है जो अभी कहा जाना बाकी है....पाठकों की भारी मांग पर अन्नू बाबू की जिंदगी के बहाने अपनी जिंदगी का एक औऱ पन्ना पेश कर रहा हूं....क्योंकि सूत्रधार जॉन डीकोस्टा की वो डायरी आज फिर कुछ कहने के लिए बेचैन है....&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;अब तक आपने पढ़ा&lt;/span&gt;--अन्नू बाबू कैसे अखबार में जाते थे...तहखाने में हाजिरी बजाते थे...पानीपत से लेकर भिवानी एडिशन के पन्नों पर सिर खपाते थे...और रात को लौटते वक्त साथियों के साथ किस तरह से बहस में उलझ जाते थे...अखबार का वो बॉस जिसकी जीभ पान मसाला खाते-खाते मोटी हो गई थी...वो किस तरह से अन्नू बाबू को घुड़कता था...और अन्नू बाबू किस तरह विनीत विनम्र भाव से उसके आगे सिर नवाते थे...(हालांकि बाद में अहसास हुआ कि कई बार ओढ़ी हुई विनम्रता के बाद भी असली तेवर झलक जाता करते हैं)&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;अब आगे---वो जाड़ों के दिन थे...कुहासा ऐसा कि दफ्तर से घर लौटने की सीधी सड़क भी रात के सन्नाटे में विचित्र लगती थी...मानो भूत की तरह आप धुएं को चीरते हुए बाहर निकल रहे हों...औऱ अगले ही पल इसी धुएं में कहीं गुम हो जाएंगे....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;ऐसे ही घनघोर कुहरे औऱ खून जमा देने वाली ठंड के बीच अन्नू बाबू अपनी चिर परिचित विंड चिटर पहने माहौल को गरमा देने वाली बहस में शिरकत करते हुए सड़क पर लेफ्ट राइट कर रहे थे...घर जाने से पहले गोल चक्कर पर चाय औऱ परांठा वाले के यहां थोड़ी देर के लिए ही सही पर रुकना हमारा अक्सर का रूटीन था....उस रोज भी रुके थे....बॉस ने अन्नू बाबू को उस शाम खूब खरी खोटी सुनाई थी....मुद्दा अखबार के अंदर के पन्नों में किसी खबर की प्लेसमेंट को लेकर था....बॉस की नजर में अन्नू बाबू ने खबर को जो ट्रीटमेंट दिया था वो दो कौड़ी का था...उन्होंने तहखाने में गुर्राते हुए अन्नू बाबू को जमकर डांट लगाई.....वो माहौल भी अजब था....डांट अन्नू बाबू खा रहे थे लेकिन सांप बाकी सब को सूंघ गया था....शायद हिंदी अखबारों की भाई साहबी पत्रकारिता की ये भी एक मानसिकता है.....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;(अब भाई साहबी पत्रकारिता क्या होती है---इस पर एक चैप्टर से सूत्रधार आपको आगे कहीं जरूर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;रूबरू करवाएगा।)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बॉस ने अन्नू बाबू को डांट लगाने के बाद गुटखे का पूरा पाउच मुंह के हवाले किया औऱ कुछ मिनटों तक जुगाली करने के बाद परम संतोषी भाव से डस्टबिन को पीकदान समझ कर प्रसाद उड़ेल दिया....&lt;br /&gt;अन्नू बाबू उस रोज बड़े विचलित थे...&lt;em&gt;साली दो कौड़ी की नौकरी है....पता नहीं क्या समझता है अपने आपको....यार मिहिर छोड़ दूंगा....मेरे बस की नहीं....खेती ही कर लूंगा....लौट जाऊंगा यार.....&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;ये वाकया उसी रात का है.....दो बजे हम सब सी-१३ के साथी गोल चक्कर पहुंचे चुके थे औऱ चाय के साथ वाद विवाद का दौर गरम था....अन्नू बाबू कुछ कुछ उंघते हुए और अनमने से भाव के साथ बेंच पर बैठे थे...अचानक उठे....औऱ चल पड़े....सबने कहा---अरे अन्नू बाबू क्या हो गया...कहां जा रहे हो....उनका जवाब था नहीं यार सुबह की बस पकड़नी है.....&lt;br /&gt;अगली सुबह अन्नू बाबू वाकई हम सबकी आंख खुलने से पहले निकल चुके थे....पहले भी नहीं बताते थे कि आखिर जा कहां रहे हैं और इस बार भी बताने की कोई जहमत नहीं उठाई&lt;br /&gt;कुहासे को चीरते हुए वो कहां चले गए इसका अहसास हम सबको तब हुआ जब हम अलसाए से उठे....लेकिन अन्नू बाबू का इस तरह जाना हमें पहले भी नहीं चौंकाता था...इसलिए इस बार भी हैरान हो जाएं...ऐसी कोई वजह नहीं दिखी....&lt;br /&gt;ठंड के दिन अभी खत्म नहीं हुए थे...अब भी सुबह कुहासे में लिपटी दस्तक देती थी....सुबह तो क्या दोपहर में ही सही पर उठने के लिए हमें पहले की तरह ही जतन करने पड़ते थे....यानी सी-१३ की दुनिया अब भी वैसी ही थी... जैसी पहले थी&lt;br /&gt;ऐसी ही एक सुबह कुहासे को चीरता हुए अन्नू बाबू आ धमके...&lt;br /&gt;अगर आग रात को देर से सोने वालों में शुमार हैं तो आप समझ सकते हैं कि सुबह-सुबह कॉलबेल की आवाज से कर्कश दुनिया में और कुछ नहीं लगता...&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;उस रोज भी वैसी ही आवाज से अपने अपने कमरों में हम सबका साबका पड़ा....लेकिन उठे तो कौन...ठंड के दिनों में लिहाफ से निलकना भी तो कम बड़ी चुनौती नहीं....लेकिन हम सबके साथ नियमों के पाबंद डॉक्टर साहब भी रहते थे औऱ जब सब सोते थे वो बड़े चाव के साथ अखबार पढ़ते थे....पढ़ें चाहें नहीं भी लेकिन उनके सिरहाने सारे अखबार करीने से सजे होने चाहिए.....सो डॉक्टर साहब भी चिहुंकते हुए उठे....अरे भाई पता नहीं सुबह सुबह कौन आ गया.....दरवाजे पर अन्नू बाबू को देखकर पल भर के लिए (हालांकि मैंने नहीं देखा...लेकिन तजुर्बा बताता है कि ऐसा ही हुआ होगा) डॉक्टर साहब चौंके होंगे...चश्मा ठीक किया होगा....अरे भाई कहां गायब हो गए थे....आप भी हद हैं बताते भी नहीं...और अचानक कैसे--दफ्तर में तो खबर भी उड़ गई कि आपने रिजाइन कर दिया है....अन्नू बाबू थोड़े तरोताजा जरूर थे....लेकिन एक साथ इतने सारे सवालों से खीझ गए....कहा-हद हो गई यार....पहले अंदर तो आने दो...फिर बताता हूं...अंदर आते ही बगैर किसी सवाल का जवाब दिए वो किचेन की तरफ हो ळिए....बड़ी उदारता के साथ जितना दूध बचा था....उसे चाय बनाने के लिए स्टोव पर चढ़ा दिया...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हालांकि उनकी ये हरकत डॉक्टर साहब को बेहद नागवार गुजरी होगी....लेकिन गुस्सा उतारें तो कैसे उतारें...वो बस इतना ही कह पाए....अरे भाई आप भी सुधरिएगा नहीं...कम से कम जूते तो खोल लेते.....अन्नू बाबू ने भी चिहुंकते हुए कोई जवाब दिया होगा.....खैर ये सिलसिला ऐसा कि इसमें बताने के लिए बहुत कुछ खास नहीं&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;खैर सवाल एक फिर भी बचा रह गया था---आखिर अन्नू बाबू उस रोज कुहरे में कहां गुम हो गए थे औऱ जिस तरह गुम हुए उसी तरह आज कुहासे को चीरते हुए कहां से आ धमके...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इसका जवाब सूत्रधार आपको जरूर बताएगा....लेकिन फिर कभी....पर सौ फीसदी वादे के साथ कि पिक्चर तो अभी बाकी है मेरे दोस्त.....&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;-जॉन डीकोस्टा की डायरी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;पेज नंबर-6&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-5440855468024730608?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/5440855468024730608/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=5440855468024730608' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/5440855468024730608'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/5440855468024730608'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='...और कोहरे को चीरता वो आ गया !'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-8818813955339239473</id><published>2008-12-28T20:50:00.000+05:30</published><updated>2008-12-28T23:17:26.037+05:30</updated><title type='text'>ये साल अच्छा है...</title><content type='html'>ढलती शाम की पीली-धुंधली-सिमटती सी धूप कई बार भीड़ में भी अकेलेपन का अहसास कराती है... खासकर अगर आप इंडिया गेट जैसी जगह पर हों तो अकेलापन आपको काटने भले ही नहीं दौड़े लेकिन दार्शनिक जरूर बना देता है....इत्तफाक से क्रिसमस वाले दिन मेरी छुट्टी थी...दिन ढलने को था औऱ मैं भी पता नहीं क्यों उस रोज इंडिया गेट चला गया....&lt;br /&gt;घास पर लेटा...तो अचानक पता नहीं क्यों गुजर रहा साल जैसे मेरे सामने पूरी शिद्दत के साथ खड़ा था...हर रोज का हिसाब किताब माथे में घूम रहा था&lt;br /&gt;साल ऐसे कई गुजारे पर नहीं मालूम क्यों ऐसा लगा मानो ये साल बस बीत गया...&lt;br /&gt;घटनाएं आंखों के सामने फ्लैशबैक की तरह गुजरती चली गईं...मैं उनमें बहता चला गया....&lt;br /&gt;समय के इस प्रवाह में ज्यादा क्या कहूं...क्या ना कहूं&lt;br /&gt;लेकिन बस उम्मीद है जो हमको आपको सबको चलाए जाती है...&lt;br /&gt;गुजरा है जो, वो साल अच्छा था&lt;br /&gt;आएगा जो साल वो भी अच्छा होगा&lt;br /&gt;फिलहाल उधार की चंद लाइनों के साथ आपको छोड़े जाता हूं---&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;-एक बिरहमन ने कहा है ये साल अच्छा है&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ज़ुल्म की रात बहुत जल्द टलेगी अब तो&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आग चूल्हों में हर इक रोज़ जलेगी अब तो&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोएगा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चैन की नींद हर इक शख्स़ यहां सोएगा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आंधी नफ़रत की चलेगी ना कहीं अब के बरस&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्यार की फ़सल उगाएगी जमीं अब के बरस &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;है यकीं अब ना कोई शोर-शराबा होगा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ज़ुल्म होगा ना कहीं ख़ून-ख़राबा होगा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ओस और धूप के सदमे ना सहेगा कोई&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब मेरे देश में बेघर ना रहेगा कोई&lt;br /&gt;नए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा है&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा है&lt;br /&gt;दिल को ख़ुश रखने को गालिब ये ख़याल अच्छा है&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आमीन&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-8818813955339239473?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/8818813955339239473/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=8818813955339239473' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/8818813955339239473'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/8818813955339239473'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/12/blog-post_28.html' title='ये साल अच्छा है...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-141339771337662677</id><published>2008-12-20T23:37:00.000+05:30</published><updated>2008-12-21T00:11:45.288+05:30</updated><title type='text'>खामोश समंदर प्यासा है...</title><content type='html'>ये शीर्षक अपने दोस्त जैगम इमाम की कविता से उधार लिया है...ये गुस्ताखी मुझे करनी पड़ी...क्योंकि जब वो रौ में अपनी नज्म सुना रहे थे तो रहा ना गया....पंक्तियां यूं ही ले लीं...लेकिन इनके पीछे का फलसफा बाद में समझ में आया....जिंदगी के चौराहे पर कभी आप ठिठक जाएं तो ये फलसफा आप भी समझ जाएंगे...खैर छायावादी बातों का कोई मतलब नहीं क्योंकि जब जिंदगी दो जोड़ दो बराबर चार के नजरिए से जीनी हो तो वहां ना तो वहां कोरी भावुकता का कोई मतलब होता है औऱ ना ही रोमानी सपनों का...सामने होती है सिर्फ हकीकत की सख्त जमीन...&lt;br /&gt;लेकिन हकीकतों का तानाबाना भी तो अजब होता है....कई बार हकीकतें कल्पना की दुनिया से ज्यादा रपटीली होती हैं...ज्यादा घुमावदार होती हैं....कई बार वाकई आपको समंदर प्यासा मिल सकता है...कई बार खामोशी भी चीखती मिलती है...और चीख में भी सन्नाटा गूंजता है....&lt;br /&gt;इस सन्नाटे का कोई मर्म नहीं होता....कई बार सन्नाटे गाते हैं....कई बार आपको भीतर तक कंपकंपा जाते हैं...कभी किसी पुराने पड़ गए घर की छत पर काई लगी बदरंग दीवारों और मुंडेरों से दुनिया देखिए तो वहां से आपको दुनिया अलग दिखेगी....लेकिन कभी किसी बहुमंजिली इमारत की किसी ऊंची सी मंजिल के शीशों से झांकिए तो नज़ारा दूसरा होगा...&lt;br /&gt;खैर अपना दर्शन आप पर थोपूं...ये भी ठीक नहीं...&lt;br /&gt;फिलहाल तो इस समंदर को प्यासा ही रहने दीजिए...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-141339771337662677?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/141339771337662677/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=141339771337662677' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/141339771337662677'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/141339771337662677'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/12/blog-post_20.html' title='खामोश समंदर प्यासा है...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-6515861982625463928</id><published>2008-12-10T23:37:00.000+05:30</published><updated>2008-12-11T00:17:36.455+05:30</updated><title type='text'>आंधी की तरह उड़कर इक राह गुज़रती है...</title><content type='html'>अचानक मन उदास हो चला...कहानियां अब भी हैं जो अब सामने आ रही हैं....मुंबई हमलों की कहानियां...घटनाएं जो आज भी मन को छू जाती हैं....वाकये जो सिहरने के लिए मजबूर कर देते हैं...इस लेख के लिए हेडिंग जो चुनी बेशक वो टोन आपको बदला सा लगे...पर मुझे इस उदास दौर में सबसे बेहतर यही शीर्षक लगा...इसकी मेरे पास ना तो कोई व्याख्या है...ना ही कोई दलील...अच्छा लगा सो लिख दिया....&lt;br /&gt;मन जाने क्यों....बार बार मन मुंबई की ओर भटकता है...बल्कि यूं कहें बहकता है....उस शहर से पता नहीं कौन सा रिश्ता है जो मुझे अक्सर खींचता है....गिरगाम चौपाटी हो या फिर सिद्धिविनायक....या फिर अक्सा बीच....या जुहू चौपाटी ...गेटवे पर कबूतरों के बीच मटरगश्ती...और समंदर की लहरों के बीच स्टीमर पर घूमना.....कुछ नाता जरूर है जो मुझे मुंबई से जोड़ता है....हवाओं में अजब सी मिठास है जिसे मैं आज भी महसूस करता हूं....ना तो वहां पला-बढ़ा औऱ ना ही सालों रहा....ना बचपन गुजरा औऱ ना ही बाद के दिन....लेकिन मैं उस शहर में जाता रहा हूं....वहां की गंध को आत्मा से महसूस किया है.....वो गंध आज भी मुझे लुभाती है....&lt;br /&gt;और यही वजह है कि 26 नवंबर के हमलों के बाद वो शहर मुझे और अपना लगने लगा है...कुछ दोस्त हैं जो वहां से अक्सर मुझे याद करते हैं....कुछ पुराने नाते हैं जो शहर से रिश्ता तोड़ चुके हैं....लेकिन मुझे उनके बहाने भी मुंबई बहुत याद आती है....&lt;br /&gt;शायद मुझे इसीलिए गुलजार की ये पंक्तियां याद आ रही हैं....&lt;br /&gt;शायद इसीलिए आज मन बहक रहा है...&lt;br /&gt;काश कि कोई राह होती जो आंधी की तरह उड़कर हमें मंजिलों तक पहुंचा सकती....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-6515861982625463928?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/6515861982625463928/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=6515861982625463928' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/6515861982625463928'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/6515861982625463928'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/12/blog-post_10.html' title='आंधी की तरह उड़कर इक राह गुज़रती है...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-7647860409087269085</id><published>2008-12-06T21:49:00.000+05:30</published><updated>2008-12-06T22:13:12.170+05:30</updated><title type='text'>मोशे फिर मुस्कुराएगा...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/STqqSOi4E3I/AAAAAAAAADU/JuLde8JIVpE/s1600-h/moche+new.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5276717143536702322" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 248px; CURSOR: hand; HEIGHT: 178px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/STqqSOi4E3I/AAAAAAAAADU/JuLde8JIVpE/s320/moche+new.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मुंबई के आतंकी पागलपन को गुजरे कई दिन हो गए...लेकिन चौबीसों घंटे टीवी चैनलों पर तबाही का जो मंजर दिखाया गया वो अभी ताज़ा है...घाव अभी सूखा नहीं है....आतंकी हमले पहले भी हुए हैं...लेकिन जो खूनी छाप इन हमलों ने छोड़ी है...उसे मिटाना बहुत मुश्किल है....बहुत मुश्किल है...मोशे को भूलना...रोता बिलखता मोशे...जिसे कमांडो ऑपरेशन में बचाया गया....दो साल का मोशे जिसके मां बाप नरीमन हाउस में आतंकियों की भेंट चढ़ गए...वही मोशे अब सात समंदर पार अपने वतन इस्राइल लौट गया है....लेकिन उसका चेहरा पूरी दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ सबसे बड़े प्रतीक के तौर पर उभर कर सामने आया है....उसका रोना दिल को हिला देने वाला है....उसके आंसू किसी पत्थरदिल को भी पिघलाने की कूवत रखते हैं....मोशे जिस प्लेन से अपने वतन लौटा उसी प्लेन पर ताबूत में उसके मां-पिता के शव भी भेजे गए...मोशे को अभी नहीं मालूम कि आतंकवाद क्या होता है...आतंकवादी क्या होते हैं....उसे तो ये भी नहीं मालूम कि किस जुर्म की सजा उसे मिली...उसे क्या मालूम कि उसका बचपन अब कभी पहले जैसा नहीं हो पाएगा....लेकिन हमें मालूम है....हमें मालूम है कि उसके मां-बाप अब कभी लौटकर नहीं आएंगे...कभी उसकी मां उसे गोद में नहीं खिला पाएगी....पिता का दुलार भी उसे भला कब मिल पाएगा....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;क्या आपने मुंबई की उस अजीब सी सुबह में इस्राइली प्रार्थनाघर में वो मातम की भीड़ देखी थी...अगर देखी होगी तो क्या आप अपने आंसूओं पर काबू रख पाए होंगे....वो लोग मोशे के मां-पिता की मौत का मातम मनाने जुटे थे...उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जा रही थी...उसी भीड़ में मोशे भी चुपचाप बैठा था....उसके हाथों में लाल गेंद भी थी...साइनागॉग में बेशुमार लोगों की भीड़ के बीच भी उदास कर देने वाली खामोशी थी....जब भी मोशे रोता....लोग उसके साथ रोते....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अब मोशे अपने वतन लौट गया है&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अब अगर सच्चे मन से कोई प्रार्थना करनी है तो बस यही कीजिए कि एक बार फिर से मोशे मुस्करा सके....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक बार फिर से उसके चेहरे पर हंसी लौट आए....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;इन जख्मों को भूलकर वो फले फूले&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मोशे एक बार फिर से मुस्कुराए&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आमीन&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-7647860409087269085?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/7647860409087269085/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=7647860409087269085' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/7647860409087269085'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/7647860409087269085'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='मोशे फिर मुस्कुराएगा...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/STqqSOi4E3I/AAAAAAAAADU/JuLde8JIVpE/s72-c/moche+new.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-1552440633298580819</id><published>2008-11-18T09:44:00.000+05:30</published><updated>2008-11-18T10:09:20.922+05:30</updated><title type='text'>उस शहर में मेरा घर भी था...</title><content type='html'>उस साल दिल्ली में जाड़े ने सबको कंपकपा दिया था...पीली बीमार सी धूप...मोटे लबादे भी बेअसर ....तभी एक रोज दिसबंर के महीने में नई दिल्ली स्टेशन पर अकबकाया सा एक ट्रेन से उतरा था...बेशुमार भीड़ में कहीं खोया सा...भीड़ के रेले के साथ साथ हो लिया....बाहर निकला तो पाया कि ये अजमेरी गेट है....जुबान बदली हुई...लोगों के अंदाज बदले हुए....दोपहर का सूरज पूरी तरह परवान नहीं चढ़ा था....उचटती निगाहों से सबकुछ समझने का भाव चेहरे पर ओढ़े हुए मिंटो रोड पहुंचा और फिर वहां से साकेत की ५०१ नंबर की बस पकड़ ली...पास में एक एयरबैग जो अब भी घर के किसी कोने में पड़ा धूल खा रहा है...साकेत को लेकर कई किस्से थे...पॉश कॉलोनी है....बड़ी इमारतें हैं....सबकुछ हाईप्रोफाइल...अपमार्केट....लेकिन मेरी बस यात्रा खत्म होने के साथ ही शुरू हो गया सपनों की रंगीन दुनिया के बिखरने का सिलसिला....मालूम चला कि पुष्प विहार में रहना है जोकि साकेत इलाके से सटा हुआ है....सरकारी बाबुओं की कॉलोनी है...उसी में टाइप वन के एक क्वार्टर में दूर के रिश्तेदार के पास रूकना था...जिन सज्जन के साथ रुकने का इंतजाम था वो खुद वहां एक कमरे में किराये पर रह रहे थे....पहुंचते ही ज्ञान देने का सिलसिला शुरू हो गया....इस शहर में कोई किसी का नहीं है...काम से काम रखा जाता है....अपना रास्ता खुद तलाशना होगा....बेशर्म बनना होगा...मुझसे भी कोई उम्मीद नहीं रखना...ये सब तुमको स्मार्ट बनाने के लिए बोल रहा हूं....और आखिरी वाक्य...जल्दी से अपना कोई इंतजाम भी कर लो.....हालांकि तब उनकी बातें बहुत रुखी लगी थीं....लेकिन आज इतने बरस गुजर जाने के बाद लगता है कि इस शहर में वो बातें तब भी सही थीं और शायद आज भी....&lt;br /&gt;जिंदगी के कई फंडों की घुट्टी पिलाई गई....वैसे वे फंडे तब काम के नहीं मालूम पड़ते थे....लेकिन अब लगता है कि वाकई उनमें बहुत दम था....एक फंडा था...कोई काम ना भी हो तो बस से घूमकर आ जाओ...कुछ नहीं तो कनाट प्लेस में ही जाकर भटक आओ....तो कभी अखबारों में नौकरियों वाले इश्तेहारों को देखने की सलाह देते...और किसी किसी दिन तो जबरदस्ती वॉक-इन इंटरव्यू के लिए मुझे ठेलकर भेज भी देते.....इस पूरी कवायद  का इतना फायदा तो जरूर हुआ कि अजनबी से इस शहर को मैं थोड़ा थोड़ा जानने लगा...&lt;br /&gt;खाने-पीने के तौर तरीके सीखे...ढाबों में बटर के साथ रोटी और अंडे की &lt;em&gt;भुज्जी&lt;/em&gt; और &lt;em&gt;दाल फ्राइ&lt;/em&gt; का सलीका सीखा....&lt;br /&gt;ठंड के उन दिनों में शामें कई बार उदास होती थीं....धुंधली सी ढलती ढामों में कई बार जीने का मतलब समझ में नहीं आता था....तब एक अदद घर की तलाश थी....&lt;br /&gt;फिर पता चला कि कुछ पुराने दोस्त हैं जो पुरानी दिल्ली की एक गली में घर किराये पर लेकर रहते हैं....मैं भी एक रोज अपना बोरिया बिस्तर उठाकर उसी गली में पहुंच गया....उसी गली का नाम था गली करतार सिंह.....&lt;br /&gt;जिंदगी में अभी कई मोड़ आने बाकी थे....गली करतार की अपनी जिंदगी थी...अपने उसूल थे....लेकिन ये किस्सा फिर कभी.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-1552440633298580819?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/1552440633298580819/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=1552440633298580819' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/1552440633298580819'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/1552440633298580819'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/11/blog-post_17.html' title='उस शहर में मेरा घर भी था...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-9091277714455181213</id><published>2008-11-17T09:18:00.000+05:30</published><updated>2008-11-17T09:31:31.336+05:30</updated><title type='text'>उसे भूलने की दुआ करो!</title><content type='html'>चमकती दमकती दुनिया का ये वो कड़वा सच है जिसका दर्द दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में कभी भी महसूस किया जा सकता है...आपके सामने से बेहद परिचित सा चेहरा गुजर रहा है...लेकिन उसकी निगाह मे एक अजीब सा अजनबीपन है...एक सर्द सा अहसास....वो आपको पहचान रहा है...लेकिन फिर भी अनजान है....भई उसकी अब हैसियत हो गई है...बड़ी कार पर घूमता है...बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं औऱ उसकी बीवी भी अब अंग्रेजी बोलने लगी है....कभी किसी पॉश कॉलोनी के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में टकरा जाए तो उससे ये उम्मीद मत रखिएगा...कि वो आपको तपाक से लगे लगा लेगा...किसी मॉल में सामने से आ रहा हो तो गनीमत इसी में है कि आप किसी बगल की दुकान में शोकेस पर रखी चौंधियाती चीजें देखने लगें...लेकिन फिर भी नजर मिल गई...और आप हंस दिए....तो गए काम से...क्योंकि उसकी आंखों का अजनबीपन आपको भीतर तक चीर कर रख देगा...&lt;br /&gt;दोस्तों ये समय वाकई त्रासद है...यहां कई बार आपको जीने के ऐसे ही मौके मिलेंगे....लोगों की ऐसी ही बर्फीली निगाहों का  सामना करना पड़ेगा....क्योंकि इस शहर में सबकी कुछ ना कुछ हैसियत है...और हर अगला अपने आप में किसी तोप से कम नहीं....तो फिर हमारे-आपके लिए सही क्या है...सही तो खैर नहीं मालूम...लेकिन हो सके तो चढ़ती ठंड के इन दिनों में छत पर गुनगुनी धूप में दरी या चटाई पर लेटकर मजे से पढ़िए (अगर आप छुट्टियों में हों) औऱ याद कीजिए बशीर बद्र की उन नायाब लाइनों को--जिसमें बशीर साहब फरमाते हैं---तुम्हे जिसने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-9091277714455181213?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/9091277714455181213/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=9091277714455181213' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/9091277714455181213'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/9091277714455181213'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='उसे भूलने की दुआ करो!'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-7695761069367830246</id><published>2008-11-01T03:45:00.000+05:30</published><updated>2008-11-01T04:18:47.513+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>बंद गली का आखिरी मकान!</title><content type='html'>अक्सर सियासत से जुड़े लोगों की शिकायत होती है कि चाहे मसला कुछ भी हो सारा दोष उनपर मढ़ दिया जाता है। हो सकता है एक-आध मामले में उनकी आपत्ति वाजिब हो...लेकिन ज्यादातर मामलों में नहीं....मराठी मानुष के बहाने सियासत का कोड़ा फटकार रहे राज ठाकरे औऱ हाल के दिनों की कई घटनाओं पर गौर करें तो तस्वीर साफ हो जाएगी। मुंबई  जब जल रही होती है तब न तो केंद्र सरकार फिक्र करती है औऱ ना ही राज्य सरकार। उत्तर भारतीय हांके जा रहे होते हैं तो केंद्र से लेकर राज्य तक ऐसा कोई भी ठोस कदम उठाने की जरूरत नहीं समझी जाती जिससे लगे कि हां इस मुल्क में संविधान का राज है...कानून-व्यवस्था का आदर है...दिखाने के लिए राज ठाकरे की गिरफ्तारी होती है...औऱ शहीद का जामा देकर उन्हें पूरी इज्जत के साथ हीरो बनाकर वापस घर भेज दिया जाता है...जहां वीरों की तरह उनका स्वागत किया जाता है....जब इसी सियासत की भेंट चढ़े एक जवान बेटे की अर्थी पटना में  उठ रही होती है तो दूर दिल्ली में नेता राजनीति की नूरा कुश्ती में ताल ठोंक रहे होते हैं...यहां कुसूर सिर्फ राज ठाकरे का नहीं है...ये पूरी की पूरी जमात ही कुछ ऐसी है...अब सबको पता है कि जिस विचारधारा की उपज राज ठाकरे हैं वो विचारधारा शिवसेना की है...शिवसेना यानी बीजेपी की साझीदार...उसी बीजेपी की साझा सरकार जेडी यू के साथ बिहार में चल रही है....लेकिन जेडी यू के नेता घड़ियाली आंसू बहाने से गुरेज नहीं कर रहे हैं...अगर वाकई जेडी-यू महाराष्ट्र की घटनाओं से आहत है तो बीजेपी को शिवसेना से अलग होने के लिए क्यों नहीं कहती...और अगर बीजेपी शिवसेना से नाता नहीं तोड़ती तो वो अपने रिश्ते बीजेपी से खत्म क्यों नहीं कर लेती...बीजेपी राष्ट्रीय एकता की दुहाई देते नहीं थकती...लेकिन क्या मराठी अस्मिता के झंडाबरदारों की करतूतों पर उसके किसी भी लौहपुरुष माने जाने वाले नेता का सख्त बयान आया है? ये तमाम सवाल चुनाव के वक्त जनता जरूर पूछेगी...और तब नेताओं को जवाब देना भारी पड़ जाएगा...&lt;br /&gt;केंद्र सरकार की बात करें....तो पहली बार पीएम मनमोहन सिंह की ओर से बयान कल आया...सरकार को इतने दिन गुजर जाने के बाद शायद मसले की गंभीरता का अहसास हुआ....लेकिन ये लेटलतीफी क्यों...आखिर आप केंद्र की गद्दी पर बैठे किस लिए हैं...जब आप कानून-व्यवस्था के एक मामूली से मसले को नहीं सुलझा सकते....तो भाड़ में जाए ऐसी व्यवस्था...&lt;br /&gt;लेकिन सबसे ज्यादा शाबासी की हकदार तो माननीय विलासराव देशमुख की सरकार है...खासतौर से महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटील ज्यादा तारीफ के पात्र हैं। मेमने का एनकाउंटर कर बर्बर शेर की खातिरदारी हो  रही है और पाटील हर मौके पर कानून-व्यवस्था का गुणगान करने से बाज नहीं आते...अब राज ठाकरे की कल की प्रेस कांफ्रेंस को ही लें जिसमें वो बड़ी विनम्रता के साथ बखान कर रहे हैं कि छठ पूजा को लेकर कोई विरोध नहीं...लोग पूजा करें वो कोई विघ्न नहीं डालेंगे....लेकिन लाख टके का सवाल ये है राज &lt;em&gt;साहेब &lt;/em&gt; कि ये लाइसेंस आपको किसने दिया कि आप किसे पूजा करने दें किसे नहीं! यहां ये भी बताना लाजिमी होगा कि राज ठाकरे की प्रेस कांफ्रेंस पर कोर्ट की पाबंदी लगी हुई है...फिर भी उन्हें पुलिस की ओर से छूट दी गई औऱ प्रेस कांफ्रेंस की इजाजत मिली...&lt;br /&gt;ऐसे में क्या ये मान लिया जाए कि हमारी संवेदनाएं जहां खत्म होती हैं सियासत वहीं से शुरू होती है...या उलटकर कहें तो राजनीति जहां शुरू होती है वहां भावनाएं खत्म हो जाती हैं...खैर ये नतीजा हमें आपको सबको मिलकर निकालना है....फिलहाल तो ये सियासत बंद गली के आखिरी मकान की तरह है जिसमें बेदर्द हाकिमों के आगे आम आदमी की फरियाद नक्कारखाने में तूती से ज्यादा बिसात नहीं रखती...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-7695761069367830246?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/7695761069367830246/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=7695761069367830246' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/7695761069367830246'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/7695761069367830246'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/10/blog-post_31.html' title='बंद गली का आखिरी मकान!'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-5492444954330932825</id><published>2008-10-31T01:48:00.000+05:30</published><updated>2008-11-01T03:01:56.255+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>बड़ा बेदर्द पेशा है, इसमें कोई साझीदार नहीं!</title><content type='html'>वो खबर आंखों के आगे से किसी भी आम खबर की तरह गुजर जाती...लेकिन ऐसा नहीं था...जिंदगी के चंद बरस साथ काम किया था...एक ही दफ्तर में आना जाना...चंद डेस्कों का फासला...लेकिन ये फासला अक्सर मिट जाया करता...जब हम किसी बात पर मजाक करते...गपियाते...हंसते-बोलते....किसी मुद्दे पर किसी की धज्जियां उड़ाते....लेकिन अचानक वो मनहूस खबर आंखों के आगे से गुजरी तो अंदर तक हिल गया...हां, दीवाली के दिन ही तो नज़र पड़ी थी उस खबर पर...पल भर के लिए यकीन नहीं हुआ...खबर थी एक पत्रकार के असमय निधन की...शैलेंद्र प्रसाद...दिल्ली के एक अखबार में सालों से काम कर रहे थे....जिन लोगों ने उन्हें देखा था...साथ काम किया था...वो उनका मुस्कुराता चेहरा कभी नहीं भूल सकते...वही शैलेंद्र जी अब हमारे बीच नहीं हैं...फिर दूसरी खबर ये भी सामने आई कि उनके अंतिम संस्कार के वक्त उस अखबार का कोई भी बड़ा नाम मौजूद नहीं था...जिस अखबार के लिए शैलेंद्र जी ने सालों खून पसीना बहाया...जिसके लिए जिंदगी के कई साल खाक किए....जाड़े-गर्मी की परवाह नहीं की....&lt;br /&gt;दरअसल आप पाठक हैं तो अखबारों और पत्रकारों की ताकत के तमाम किस्से सुनते हैं...लेकिन बाहर से चमत्कारी औऱ तिलिस्मी दिखने वाली इस दुनिया के कई अंधेरे कोने हैं...कई अंधी सुरंगें हैं...बिचौलियों की एक पूरी लॉबी है जो मालिकान के इर्द गिर्द कुंडली जमाए बैठी रहती है...जिनकी वजह से आम पत्रकारों की आवाज कभी नहीं सुनी जाती...ये व्यवस्था अभी से नहीं सालों से हिंदी अखबारों को खाए जा रही है...ऐसा नहीं कि सारे अखबारों का यही हाल है...लेकिन बड़े अफसोस के साथ कहना चाहूंगा कि हिंदी पट्टी के ज्यादातर अखबारों को ये घुन बरसों से खाए जा रहा है...संपादक दिन-ब-दिन मालिक से भी अमीर होता जा रहा है....जबकि आम पत्रकार का बुरा हाल है...वो पत्रकार है...तो हौसला उसके अंदर जरूर होगा...वो आपके सामने रोएगा-गिड़गिड़ाएगा नहीं ये भी सच है...लेकिन उसकी माली हालत की भी जरा सोचिए...ये भी सोचिए कि एक दिन जब वो चल बसेगा तो उसकी मौत पर आंसू बहाने भी अखबार से कोई नहीं आएगा...जो अखबार करीना और बिपाशा के किस्सों से पन्ने-दर-पन्ने रंग देते हैं उन अखबारो में इतनी भी जगह नहीं होगी कि किसी पन्ने पर चौदह प्वाइंट में ही सही पर ये खबर छाप दी जाए कि उसका एक कर्मचारी अब नहीं रहा...वाकई इस पथभ्रष्ट दौर में अब किसी अखबार से आप इतनी भी सहानुभूति की उम्मीद नहीं रख सकते....&lt;br /&gt;और शैलेंद्र जी के साथ भी यही हुआ...&lt;br /&gt;दुख की इस घड़ी में पूरी आस्था के साथ बस यही प्रार्थना है कि ईश्वर उनके परिवार को हौसला दे....पीड़ा सहने की शक्ति दे...आमीन&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-5492444954330932825?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/5492444954330932825/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=5492444954330932825' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/5492444954330932825'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/5492444954330932825'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/10/blog-post_30.html' title='बड़ा बेदर्द पेशा है, इसमें कोई साझीदार नहीं!'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-465439557234112235</id><published>2008-10-30T00:37:00.000+05:30</published><updated>2008-11-01T03:04:34.710+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>हत्यारे दौर में अब किसी को नाम मत बताना !</title><content type='html'>जिन लोकल ट्रेनों को मुंबई की लाइफ लाइन कहा जाता है...वही लाइफलाइन धर्मदेव के लिए डेथ वारंट लेकर आई...बड़े अरमानों के साथ धर्मदेव ने खोपोली से लोकल पकड़ी होगी...पहले कुर्ला औऱ फिर गोरखपुर के लिए ट्रेन पकड़नी थी...पर्व के मौके पर जा रहा था...जाहिर है सभी के लिए कुछ ना कुछ तोहफे रहे होंगे...१४ महीने की बिटिया के लिए गुड़िया भी खरीदी होगी...बुजुर्ग मां-बाप के लिए भी लिया होगा कुछ सामान....लेकिन सबकुछ बिखर गया...नाम और पता बताना उसके लिए जिंदगी की सबसे महंगी औऱ जानलेवा भूल साबित हुई....ये धर्मदेव के लिए इतना बड़ा अपराध साबित हुआ कि अंधेरी हल्की सर्द हो चली रात में उन गुंडों ने उसपर ताबड़तोड़ वार किए और फिर जो हुआ वो आप सबके सामने है...&lt;br /&gt;धर्मदेव के परिवारवाले जिंदगी में कभी इस दर्द से शायद ही उबर पाएं...उसकी नन्ही बिटिया का इंतजार भी अब कभी खत्म नहीं होगा....उसके भाई...नातेदार...रिश्तेदार....सब को जो जख्म मिले हैं उसे भरने के लिए कोई मरहम काफी नहीं होगा....&lt;br /&gt;जांचें होती रहेंगी...कानून अपना काम करता रहेगा....मुंबई की लोकल ट्रेनें भी अपनी रफ्तार से दौड़ती रहेंगी....वो ट्रेन भी नहीं थमेगी जिसपर धर्मदेव ने जिंदगी का आखिरी सफर तय किया...लेकिन क्या वाकई सबकुछ पहले जैसा ही होगा...?? जवाब है शायद नहीं....दरअसल ये घटना महज घटना नहीं बल्कि गवाह है एक भरे-पूरे दौर के हत्यारा बन जाने का...दस्तावेज है सियासत की भेंट चढ़ती जिंदगियों का...ये घातक होती राजनीति के क्रूर नतीजों की ओर इशारा है....&lt;br /&gt;ऐसे में क्या आप भी अगली बार मुंबई में ट्रेन से गुजर रहे हों औऱ कोई पूछे कि आपका नाम क्या है...? तो क्या आप नाम बताएंगे! पूछे कि आप कहां के रहने वाले हैं...तो उसे ये जवाब देना चाहेंगे कि आप यूपी या बिहार के अमुक जिले के अमुक शहर से हैं....&lt;br /&gt;वाकई हत्यारा दौर है भाई...नाम बताना तो सोच-समझकर बताना&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-465439557234112235?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/465439557234112235/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=465439557234112235' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/465439557234112235'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/465439557234112235'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/10/blog-post_29.html' title='हत्यारे दौर में अब किसी को नाम मत बताना !'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-1643885716011575398</id><published>2008-10-28T04:50:00.000+05:30</published><updated>2008-11-01T03:07:18.587+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाज'/><title type='text'>इस पगलाई व्यवस्था में किसी का बचना मुश्किल है!</title><content type='html'>राहुल राज...एक ऐसा लड़का जिसे हम आप कल से पहले तक नहीं जानते थे...जो पटना से बोरिया-बिस्तर उठाए दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में मुंबई पहुंचा...कभी नहीं लौटने के लिए...उसी राहुल राज का चेहरा अब भी आंखों के सामने कौंध रहा है...बेस्ट की डबल डेकर बस की खिड़की से झांकता...डरा सहमा...हाथों में पिस्तौल...(पता नहीं नकली थी या असली!) बदहवास राहुल राज...रूट नंबर ३३२ की बस में कभी इस खिड़की को बंद करता तो कभी चिल्ला चिल्ला कर अपनी बात कहने की कोशिश करता....लेकिन तब तक देर हो चुकी थी...क्योंकि खतरा बड़ा था....लिहाजा उसका एनकाउंटर कर दिया गया...३३२ नंबर की बस में जिंदगी और मौत की इस खींचतान में सबकुछ कुछ मिनटों के भीतर खत्म हो गया....अंदर थी राहुल राज की लाश...औऱ बाहर जश्न मनाती पुलिस....फिर महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटील का फिल्मी बयान...गोली का जवाब गोली से दिया जाएगा...जिंदगी-मौत के इस पूरे ड्रामे में कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब अभी महाराष्ट्र सरकार औऱ पुलिस दोनों को देना बाकी है....क्या राहुल राज को जिंदा नहीं पकड़ा जा सकता था....क्या ये कारगर नहीं होता कि उसे बातों में उलझाए रखा जाता और फिर उसे काबू में करने की कोशिश की जाती....क्या हमारी पुलिस एक हार्डकोर क्रिमिनल औऱ अचानक जज्बाती हो गए एक लड़के में कोई फर्क नहीं समझती....राहुल राज कोई आतंकवादी नहीं था...उसके घरवालों, दोस्तों-करीबियों, पटना में उसके इलाके की पुलिस सभी के बयान इसी की तस्दीक करते हैं... मेरा ये कतई मतलब नहीं कि राहुल ने जो तरीका अपनाया उसे सही साबित करूं...बल्कि यहां जरूरी ये है कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया....इसके पीछे की वजह क्या है...इसके लिए आपको थोड़ा पीछे जाना होगा....मुंबई के उस मंजर को याद करना होगा जब एमएनएस के गुंडे उत्तर भारतीय छात्रों को खदेड़ खदेड़ कर मार रहे थे...परीक्षा हॉल से खदेड़ रहे थे औऱ स्टेशनों पर पीट रहे थे....टीवी पर हर छोटी बड़ी खबर को ब्रेकिंग न्यूज बनाने के इस दौर में ये तस्वीरें भी चौबीसों घंटे दिखाई जाती रहीं...इन तस्वीरों को देखकर बिहार में जो प्रतिक्रिया हुई वो भी आप सब के सामने है...ऐसे में हो सकता है कोई बेरोजगार बहक जाए...उसकी भावनाओं पर असर पड़े...उसके दिलो-दिमाग में नफरत का ज़हर भर जाए...उसकी दिमागी हालत का अंदाजा लगाइये...सबकुछ साफ हो जाएगा...लेकिन संवेदनहीन होते इस दौर में इसकी फिक्र कौन करता है....किसे मतलब है कि कौन जिंदा है...कौन मर गया....ऐसे में मुंबई जैसे महानगर में एक दिन किसी बस पर सवार कोई नौजवान अगर राज ठाकरे को चीख-चीखकर चुनौती देने लगे...हवा में तमंचा लहराने लगे....तो ये मत समझिएगा कि वो आतंकवादी है...वो अपराधी है....दरअसल ये खोट इस पगलाए हुए दौर का है जिसमें किसका सिर कब फिर जाए कहना मुश्किल है...जिसमें नियति कब किसको राहुल राज बना दे...कहना मुश्किल है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-1643885716011575398?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/1643885716011575398/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=1643885716011575398' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/1643885716011575398'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/1643885716011575398'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/10/blog-post_27.html' title='इस पगलाई व्यवस्था में किसी का बचना मुश्किल है!'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-2971049621233083393</id><published>2008-10-25T00:29:00.000+05:30</published><updated>2008-11-01T03:11:55.732+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जॉन डीकोस्टा की डायरी'/><title type='text'>...फिर नींद रात भर क्यूं नहीं आती!</title><content type='html'>&lt;span style="color:#3366ff;"&gt;सपने, बाइक और सी-१३ का आखिरी कमरा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नींद से नींद का सफर कैसा होता है...ये कोई अन्नू बाबू से सीखे...सोने से प्रिय कुछ भी नहीं...शायद इसलिए कि सपनों से उन्हें बहुत लगाव था....लेकिन सपने, बाइक और सी-१३ के आखिरी कमरे में ही जिंदगी तो नहीं चलती...अखबार के तहखाने में हाजिरी भी लगानी तो पेट के लिए जरूरी थी....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;तहखाने में चापलूसी, चापलूसों में अन्नू बाबू.... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000000;"&gt;भाई साहबी पत्रकारिता के दिन....न्यूजरूम नुमा तहखाना...अमूमन किसी छोटे मोटे कारखाने की तरह नज़र आता....जहां एक कोने में बैठा बॉस रूपी सुपरवाइजर लगातार जुगाली करता रहता....मोटे चश्मे से झांकती आंखें अखबारो में कुछ तलाशतीं...वो खीझता...अरे यार क्या हेडिंग लगा दी...गजब की सूंघने की शक्ति पाई थी उसने...पता नहीं उसे कैसे आभास हो जाता कि ये काम अन्नू बाबू का ही है....फिर क्या था....टेबल के इस पार खड़े होकर अन्नू बाबू को देर तक प्रवचन सुनना पड़ता....लेकिन जरा ठहरिए ये मत सोचिएगा कि वो बॉस वाकई अन्नू बाबू को लेकर बेहद क्रूर था...खुद अन्नू बाबू ने एक बार दोस्तों के सामने गवाही देते हुए कहा था कि बॉस तो उन्हें बेहद मानता है...लेकिन क्या करोगे भाई नौकरी की भी तो अपनी मजबूरी होती है...(यहां सूत्रधार ये साफ करना चाहेगा कि जिस बॉस का वर्णन हो रहा है वो किसी खास व्यक्ति की ओर इंगित नहीं है...बल्कि अखबारों में तो ये परंपरा सालों से परवान चढ़ रही है...) जैसा कि आपने अभी जान लिया कि बॉस अन्नू बाबू को फटकारता जरूर था लेकिन उसे मानता भी था...तब सवाल ये उठता है कि आखिर अन्नू बाबू मात कहां खा जाते थे....तो इसके लिए अब वापस लौटते हैं भाई साहबी पत्रकारिता के उन सुनहरे दिनों की ओर.....तहखाने में तब बड़ा कॉमन था....बॉस के तमाम करीबी जमकर भाई साहब को मक्खन लगाते...अरे भाई साहब आपने क्या हेडिंग लगाई....तो कोई दो कदम आगे रहने की स्टाइल में बोल पड़ता ...भाई साहब आपकी कमीज तो बड़ी शानदार लग रही है...कोई भाई साहब को पुराने दिनों की याद दिलाता...न्यूज रूम को ये अहसास कराता कि भाई साहब तो बड़े महान पत्रकार हैं....उनकी रिपोर्ट पर कितना हंगामा हुआ था...सरकारें कैसे हिल गई थीं...प्रशासन कैसे थर-थर कांपता था....महिमामंडन का ये वो दौर था जिसमें अन्नू बाबू भीड़ में शामिल जरूर दिखते ...लेकिन अंदर ही अंदर एक बेचैनी उनमें उबाल मार रही होती.....तो क्या इस बेचैनी में भी कभी उफान आता है...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;ये जरूर बताएंगे...लेकिन सूत्रधार जॉन डीकोस्टा को फिलहाल दीजिए इजाजत&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जॉन डीकोस्टा की डायरी, पृष्ठ संख्या-5&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-2971049621233083393?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/2971049621233083393/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=2971049621233083393' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/2971049621233083393'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/2971049621233083393'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/10/blog-post_24.html' title='...फिर नींद रात भर क्यूं नहीं आती!'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-8765434697955124972</id><published>2008-10-24T00:22:00.001+05:30</published><updated>2008-11-01T03:14:01.028+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जॉन डीकोस्टा की डायरी'/><title type='text'>गतांक से आगे...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SQEzxrA_30I/AAAAAAAAADM/4nmTbZUfEKk/s1600-h/annn.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5260542768198967106" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SQEzxrA_30I/AAAAAAAAADM/4nmTbZUfEKk/s320/annn.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अबतक आपने पढ़ा&lt;/span&gt;-एक खत अचानक मिलता है...उस सुबह...सी-१३ के दरवाजे पर&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;अब आगे&lt;/span&gt;...अलसाई भीगी औऱ सीली सुबह का मोह छोड़कर...लिहाफों की गरमाहट से बाहर निकलकर हॉट डिस्कशन का दौर शुरू....कुछ वाकई चिंतित तो कुछ के मन में बस ये चिंता सता रही थी कि आखिर अन्नू बाबू ने इस तरह झटके में अलविदा कैसे कह दिया...तो एक दो की चिंता ये भी थी कि अन्नू बाबू ने अपना इस महीने का शेयर नहीं दिया...शेयर बोले तो किराये में हिस्सेदारी...मेस का खर्च...जो लोग उनके खाने खर्चे की चिंता कर रहे थे वे गुस्से में भी थे...ये अन्नू बाबू ने ठीक नहीं किया....खैर उस सुबह और भी बहुत कुछ हुआ...लेकिन ये कहानी फिर सही...सूत्रधार जॉन डीकोस्टा की डायरी के कई पन्ने उसी सुबह की कहानी से रंगे हुए हैं॥&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;फ्लैशबैक&lt;/span&gt;---अन्नू बाबू किस दुनिया के जीव थे...क्या अंतरिक्ष के वाशिंदे थे...क्या उनकी अपनी अलग कोई सल्तनत थी...या फिर थी कोई औऱ कहानी....&lt;br /&gt;खुद अन्नू बाबू ने बताया था...छोटी मोटी रियासत से आते हैं....वो रियासत जो अब लुटपिट चुकी है....परिवार के नाम पर हमेशा खामोश रहे....हम सबके सामने उनकी निजी जिंदगी का परदा एक बार बेहद झन्नाटेदार तरीके से उठा था....जिंदगी के कुछ पन्ने खुले थे....लेकिन हममें से किसी ने तब उनको कुरेदा नहीं था.....पहले उस अखबार में लौटते हैं जहां तहखाने में अन्नू बाबू खबरों की भीड़ में गुम हो जाते थे....वो तहखाना आज भी वहां मौजूद है....साथी पत्रकारों से गुलजार...डेडलाइन की मारामारी...और बॉस का डंडा....थके पस्त &lt;em&gt;चौदहवीं शताब्दी के कंप्यूटरों&lt;/em&gt; में जूझते अन्नू बाबू...ऐसी निर्मम भीड़ से घिरे अन्नू बाबू जहां हर दूसरा आदमी खुद को तुर्रम खां से कम नहीं समझता...अपनी विद्वता पर गर्व से सीना चौड़ाकर घूमने वालों की भीड़, जिनकी नज़र में सामने वाला किसी बेवकूफ से कम नहीं....सबकी यही शिकायत यहां तो क्रिएटिविटी ही नहीं है.....ऊपर से वो बॉस....जो दोपहर से ही तहखाने में ऐसे जमता कि उठने का नाम नहीं लेता....हां ऑफिस आने से पहले पान मसाले की लड़ी लेना नहीं भूलता...मसाला चबाते चबाते जीभ तो मोटी हो ही गई थी...अक्ल का भी कुछ यही हाल था....और पता नहीं क्यों अन्नू बाबू हमेशा उसकी टार्गेट में होते थे...बाद में सुना वो बॉस बहुत बड़ा बॉस गया और एक अखबार का यूनिट हेड (बोले तो स्थानीय संपादक)...सच पूछिए तो जिंदगी के उस दौर में अन्नू बाबू को अपने दुखों की सबसे बड़ी वजह वो स्थानीय संपादक ही नज़र आता था....&lt;br /&gt;जॉन डीकोस्टा की डायरी-पृष्ठ संख्या-4&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-8765434697955124972?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/8765434697955124972/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=8765434697955124972' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/8765434697955124972'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/8765434697955124972'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/10/blog-post_23.html' title='गतांक से आगे...'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SQEzxrA_30I/AAAAAAAAADM/4nmTbZUfEKk/s72-c/annn.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-6016069533549323623</id><published>2008-10-22T00:16:00.000+05:30</published><updated>2008-11-01T03:15:40.736+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जॉन डीकोस्टा की डायरी'/><title type='text'>जब आया आखिरी खत</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SP4of-onH5I/AAAAAAAAABM/FMlfVIvdGBE/s1600-h/annu.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5259685944669708178" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SP4of-onH5I/AAAAAAAAABM/FMlfVIvdGBE/s320/annu.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;उस रोज भी हमेशा की तरह सूरज निकला....जाड़े की सुबह...बादलों से ढंका आसमान...गीली सर्द सुबह......रात भर झमाझम बारिश हुई...बाहर भीगती रही अन्नू बाबू की बाइक...नालों में पानी भर गया था...पेड़ जो मुहल्ले में थोड़े बहुत बच गए थे उनमें से दो तीन अपन के अहाते में भी थे....वे सब भी अहसास दिला रहे थे कि वाकई रात किस तरह से बरसती रही है....पानी पानी जमीन...बादल बादल आसमान....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;चौराहे तक सिगरेट लाने जाते भी तो कैसे...दूसरे कमरे में सो रहे दोस्तों की सिगरेट से काम चलाने की जुगत की...लेकिन अफसोस....सारी सिगरेटें रात की बहस में धुआं हो चुकी थीं.....रजाई से निकलना भी मुश्किल....बाहर जाने की कौन कहे....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हां...तभी वो पोस्टकार्ड आया...आया नहीं बल्कि यूं कहें कल ही पहुंच चुका था किसी की नजर नहीं पड़ी आते जाते पैरों से अनायास दबे कुचले पोस्टकार्ड की क्या बिसात....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;डॉक्टर साहब भी जग चुके थे...हम पांच में सबसे सात्विक...इतने साधु कि सिगरेट पीने का मतलब कैरेक्टर लेस होने से कम नहीं...औऱ एक-आध पैग लगा ली फिर तो उनकी नज़र में आपसे अधम दुनिया में कोई नहीं...&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;डॉक्टर साहब चश्मा पहन चुके थे...पोस्टकार्ड को गौर से उलट पलट कर देखा....और चिकोटी काटकर अपने रूम सखा को जगाया..अजी देखिए...ये अन्नू बाबू हैं ना बड़े गजब हैं भाई....अरे उठिए ना...देखिए तो सही क्या चिट्ठी भेजे हैं....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;चिट्ठी का मजमून&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सी-13 के साथियों&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अब तक गुरु की तलाश में था...लगता है अपन को गुरु मिल गए हैं...उम्मीद है तुम सभी को मेरी कमी खलेगी....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बस इतना ही...&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जॉन डिकोस्टा की डायरी-पृष्ठ संख्या-3&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-6016069533549323623?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/6016069533549323623/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=6016069533549323623' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/6016069533549323623'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/6016069533549323623'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/10/blog-post_21.html' title='जब आया आखिरी खत'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SP4of-onH5I/AAAAAAAAABM/FMlfVIvdGBE/s72-c/annu.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-4020846635704521178</id><published>2008-10-21T01:25:00.000+05:30</published><updated>2008-11-01T03:18:37.738+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जॉन डीकोस्टा की डायरी'/><title type='text'>इस कहानी में कई मोड़ हैं</title><content type='html'>यादों के गलियारों में टहलना कई बार खुद के लिए टीस भरे सुखद अहसास की तरह होता है तो दूसरों के लिए झल्लाहट.....लेकिन ब्लॉग के दोस्तों को बता दूं कि अन्नू बाबू न तो टीस भरे अहसास हैं औऱ न ही उन्हें जानना आपके लिए झल्लाहट भरे तजुर्बे सा साबित होगा...खैर ये कहानी फिर सही....वापस अन्नू बाबू की जिंदगानी पर लौटते हैं.....एक ऐसी कहानी पर लौटते हैं जो अभी अधूरी है...जिसका पूरा होना अभी बाकी है.....&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;पहले किरदारों का परिचय&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अन्नू बाबू सपने देखते थे....सोते...जागते...दफ्तर में काम करते....खबरनवीसी में सालों से थे...कलाकार थे...पेंटिंग करते थे...मूर्तियां गढ़ते थे...जिंदगी में रंग ही रंग...कब किस बात पर भावुक हो जाएं कहना मुश्किल...कब किस पर उखड़ जाएं...और बिफर पड़ें....ये समझना हम जैसे उनके साथियों के लिए भी आसान नहीं था....वो साथी जो उस अखबार के दफ्तर से एक किलोमीटर की दूरी पर साथ रहते थे...साथ खाते थे....साथ पीते थे....(सभी नहीं....दो तीन)और बुद्धिविलास की नौबत आई तो साथ झगड़ते थे...लेकिन रहते सभी उसी मकान में एक छत के नीचे थे...जो मकान आज भी गोल चक्कर के पास है जो तब हुआ करता था...उस मकान में गेट के अंदर दरवाजे के बाहर अन्नू बाबू की बाइक खड़ी रहती थी...अंदर सिगरेट के धुएं के बीच सपने बुने जाते थे...कहानियों के किरदार ढूंढ़े जाते थे....कविताओं की प्रेरणा तलाशी जाती थी....अखबारों का व्याकरण तय होता था...सबकुछ होता था...रात को एडिशन छोड़कर सभी लोग घर लौटते तब बहस शुरू होती...अब ये अन्नू बाबू की किस्मत का खेल कहिए...या उनकी कुंडली का सर्पदोष....अमूमन होता ये कि बहस में अन्नू बाबू एक तरह और बाकी लोग एक तरफ....लेकिन अन्नू बाबू भी ठहरे ठेठ कनपुरिया (हालांकि वो मूल रूप से कानपुर के नहीं थे....लेकिन उस शहर से भी सालों नाता रहा)...हार कभी नहीं मानते....हमेशा की तरह बहस बेनतीजा खत्म होती...हमेशा की तरह सभी साथ खाना खाते....लेकिन खाते वक्त अन्नू बाबू की थाली पर कुछेक घूरती, आड़ी तिरछी निगाहें भी होतीं...अन्नू बाबू की थाली पर ही क्यों होतीं...और आड़ी तिरछी ही क्यों होतीं (ये सबकुछ सूत्रधार जॉन डीकोस्टा आपको डायरी के अगले पन्नों पर बताएंगे)...फिर बहस का एक दौर चलता औऱ फिर सिगरेट का एक राउंड चलता...लेकिन तब तक अन्नू बाबू के पक्ष में भी कुछेक उठ खड़े होते...और बहस का सिलसिला औऱ तेज़ हो जाता....&lt;br /&gt;तब अचानक अन्नू बाबू उठते...आखिर के कमरे में कोने पर पहुंचते...लाइट जलाने की नौबत आती तो ठीक है नहीं तो अंदाजे से एक कोने में जा लुढ़कते....वैसे उनका अंदाजा बिल्कुल दुरुस्त था....(सिर्फ एक बार गड़बड़ाया था..सोकर उठे थे औऱ शीशे की ग्लास पर पैर पड़ गया था....भारी भरकम वजन के आगे ग्लास की क्या बिसात....शीशे से अन्नू बाबू का पैर लहूलुहान हो गया था...तब हम ही लोग आनन-फानन में उन्हें एक डॉक्टर के यहां ले गए थे.....)&lt;br /&gt;जॉन डीकोस्टा की डायरी-पृष्ठ संख्या 2&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-4020846635704521178?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/4020846635704521178/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=4020846635704521178' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/4020846635704521178'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/4020846635704521178'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/10/blog-post_20.html' title='इस कहानी में कई मोड़ हैं'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-90505410098043233</id><published>2008-10-14T00:05:00.000+05:30</published><updated>2008-11-01T03:20:52.325+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जॉन डीकोस्टा की डायरी'/><title type='text'>जॉन डीकोस्टा की डायरी</title><content type='html'>&lt;div align="left"&gt;पूरे आठ साल बीत चुके हैं...अब पहले जैसा कुछ कहां रहा...दरो दीवार...आस पड़ोस...गली मुहल्ले...शायद सब कुछ बदल गए....लेकिन जरा ठहरिए...इस नतीजे पर पहुंचना हो सकता है आपकी जल्दबाज़ी हो...क्योंकि वो मकान अब भी उसका इंतजार कर रहा है...उसकी मोटरसाइकिल भी तो वहीं पड़ी धूल खा रही है...अंदर तीन कमरे हैं...तीसरा और आखिर का कमरा उसका...जिसमें कोने में पड़ा उसका बिस्तर बेतरतीबी से गोल पड़ा रखा है...कहीं ऐसा तो नहीं अन्नू बाबू अचानक आ गए हैं!...हमेशा की तरह चुपचाप...बगैर किसी को बताए...डॉक्टर साहब की डांट की परवाह किए बिना...रोटी पर घी चपोरा...जितनी जल्दी परोसा...उतनी जल्दी पेट के हवाले किया...और फिर चुपचाप..फर्श पर बिस्तर बिछाने की जहमत उठाए बिना लंबलेट हो गए...क्या वाकई ऐसा ही हुआ है...या फिर ये सब सपना है....अगर ये सपना है तो फिर ये आवाज किसकी है...जो चिहुंकती हुई सी बोल रही है...स्टाइल भी बिल्कुल वैसा ही....आठ साल पहले जैसा...क्या बोल रहे हैं अन्नू बाबू...अरे य़ार बहुत थक गया था...सोचा थोड़ी नींद ले लूं....&lt;br /&gt;जॉन डीकोस्टा की डायरी...पृष्ठ संख्या-1&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-90505410098043233?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/90505410098043233/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=90505410098043233' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/90505410098043233'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/90505410098043233'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='जॉन डीकोस्टा की डायरी'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6363604372153372741.post-5133512877363757488</id><published>2007-03-25T22:20:00.000+05:30</published><updated>2007-03-25T22:28:11.941+05:30</updated><title type='text'>जब बौराए मन</title><content type='html'>मई में जब मन बौराए....दिन हवा के थपेड़ों सा उड़न छू हो जाए....शाम आकर ठिठक जाए...उन दिनों को घर की बालकनी में बैठकर याद करना...या फिर बंद पड़ी किताबों की अलमारी से कोई भूली बिसरी सी कविता पढ़ना...या फिर हर की पैड़ी पर बैठकर गंगा की लहरों में डूबते-उतराते दीयों को देखना...सोचना....गुनगुनाना...अपनी ही बातों में खो जाना..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6363604372153372741-5133512877363757488?l=galikartar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://galikartar.blogspot.com/feeds/5133512877363757488/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6363604372153372741&amp;postID=5133512877363757488' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/5133512877363757488'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6363604372153372741/posts/default/5133512877363757488'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://galikartar.blogspot.com/2007/03/blog-post.html' title='जब बौराए मन'/><author><name>मिहिर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06839221691017909261</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_PYwvopZYCVI/SPOfTzvCjVI/AAAAAAAAAA0/o0h0LwDvIdg/S220/IMG_1553.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry></feed>
